Sunday, November 29, 2020

ବିଜନତା

ମାଧବୀ ପଟେଲ।

ବିଜନ ବେଳାରେ ତୁମେ ମନେପଡ

ଆଖିକୁ ନ ଆସେ ନିଦ।

ଡନଲପ୍ ଗଦି କଣ୍ଟାପରି ଲାଗେ

ଆଖି ହୁଏ କାନ୍ଦ କାନ୍ଦ।

କାଟିଥିବା ରାତି  ତୁମର ସେ ପ୍ରୀତି

ମନେପଡେ ବାରମ୍ବାର।

ମଜାକଥା କହି ହସୁଥିଲେ କେତେ

ଉଲ୍ଲାସେ ହୋଇ ବିଭୋର।

କର୍ମମୟ ଏଇ ଜୀବନ ଜଞ୍ଜାଳେ

ଭୁଲିଯାଏ ଥରେ ଥରେ।

ବିଜନତା ହେଲେ ଗ୍ରାସେ ତୁମ ସ୍ମୃତି

ଝୁରିମରେ ବିରହରେ।

ଝାରସୁଗୁଡା।

ଡଙ୍ଗା

ମାଧବୀ ପଟେଲ।

ଜୀବନ ଡଙ୍ଗାର ନାଉରୀ ତୁମେ ତ

ସମୁଦ୍ରେ ଦେଇଛି ମେଲି।

ଝଡ ବରଷା କି ବିପଦ ପଡିଲେ

ସାହା ତୁମେ ହେବ ବୋଲି।

ଅଜଣା ପଥର ନଉକା ଟିଏ ମୁଁ

ଲକ୍ଷ୍ୟ କାହିଁ ଜାଣି ନାହିଁ।

ତୁମରି ଭକତି ଆଶ୍ରା କରି ଭାବେ

ଦିଗବଳୟ ଯିବି ଛୁଇଁ।

କର୍ମ କରିଯାଏ ଉର୍ଜା ଭରିଯାଏ

ତୁମ କଥାଦେଲେ ଭାବି।

ତୁମେ ଥିଲେ ସାଥେ  ଏ ଅଜଣାପଥ

ନିଶ୍ଚେ ମୁହିଁ ଲଙ୍ଘି ଯିବି।

ଝାରସୁଗୁଡା।

Thursday, November 12, 2020

अंधे, पर मनसे

 'अंधे, पर मनसे' is my new composition presenting on Gandhi Jayanti with the hope that it will bring some change in the society. It is an introspectional poem. Do comment and share if you like. Let us make India a country Bapu dreamt for. 


प्रेरणा : यह कविता अपने दैनंदिन जीवन में टकराने वाले कुछ विचित्र महानुभावों से प्रेरित है। ऐसे कई नमूने हमें आमतौर पर दिखते हैं। इस कविता में कुछ चुनिंदा उदाहरणों का ही सांकेतिक तौर पर जिक्र किया है। इस हास्य कविता के माध्यम से कुछ रोजमर्रा के गंभीर विषयों पर ध्यानाकर्षण करने का प्रयत्न किया है। 


अंधे, पर मनसे


ये कहीं भी दिखते, कहीं भी टकराते हैं

रास्तों पर, बाजार, सोसाइटी में

नुक्कड़ पर, गली में, गलियारों में

वैसे तो दिखने में, आम लोगों से ही दिखते हैं

इनकी नजर भी, ठीक ही होती है,

बुद्धि भी इनकी, ठीक ही होती है

मगर,  मन से वो अंधे होते हैं


कूड़ा दान के बाहर फैला हुआ, कचरा बतायेगा

कॉलोनी में कितने लोग, मन से अंधे होगे

चौराहेकी लाल बत्ती, सबको दिखती है

पर, इन्हे नहीं दिखती

इनकी हेलमेट हमेशा, हैंडल पर होती है

सर पर नहीं होती

कतार में लगने वाले, अपने नंबर पर आने वाले

इन्हें पिछड़े हुए लगते हैं, वो इन्हें मूर्खों में गिनते हैं

रेल्वे क्रॉसिंग पर बिनधास्त,

दाहिने-बाये से, बीच-बीच में घुसते हैं,

चक्काजाम करने में अपनी भूमिका, वो बखूबी निभाते है

पर इसकी इन्हें फिक्र नहीं,

वह समस्या तो दूसरों की है, इनकी नहीं,

रास्ता उल्टी तरफ से चलते-दौड़ते हैं

सही दिशा से आने वालों को, उल्टा ये ही आंखें दिखाते है

दिखता तो सब कुछ है, पर मन से अंधे जो है,


सार्वजनिक सुविधा और संपत्ति

इन्हें अपनी खुद की ही लगती,

देश, समाज, व्यवस्था, मन से अंधों के लिए

सब निरर्थक, सब बेकार‌ है

संकेतों, निर्देशो के पालन से, 

इनकी इज्जत निलाम हो जायेगी

'यहां पेशाब करना मना है'

'यहां थुंकना मना है'

'यहां पार्किंग मना है'

इनके लिए 'मना' का मतलब है 'मन मर्जी'

ये वही करेंगे जिसके लिए मनाई है

दिखता सब कुछ है, समझता भी सब कुछ है

पर, इन्हें गलती का एहसास होता ही नहीं

इनका इससे कोई नाता ही नहीं,

दूसरों की भावना, अंतर्मनको छूती ही नहीं, 

"निर्लज्जम् सदासुखी" इन्हीं को कहते है

अंतःकरण में, ये‌ अंधे होते हैं,


ये होते हैं, हर क्षेत्र में,

उद्योग, वकालत, राजनीति, नौकरी-पेशा, शिक्षण आदि

ये मिलते भी हैं सब जगह,

प्रवास, बस, सिनेमाघर, माॅल, मार्केट, रेलगाड़ी

ये हर वर्ग में दिखते हैं

अमीर-गरीब, जात-पात, धर्म

इनका बस एक ही नाता, वो है इनके कर्म

शब्दावली में इनके, सिर्फ एक शब्द नहीं, 'शर्म'

रिक्शा, ऑटो से लेकर मर्सिडीज कार तक

केले के छिलके, कोक और पानी की बोतल

खिड़की से ना फेंके, तो सफर इनका विफल

नदी के पानी में, बीच पुलिया में रुक कर

कचरे की थैली, अगर  ना करें खाली

मोक्ष प्राप्त इनको, होगा ही नहीं

अगर इन से, कहीं टकरा गये आप,

या तो  होगा झगड़ा, या लगेगी आपकी वाट,

मगर, मनसे अंधो का कभी, कम ना होगा ठांठ,


भेलपुरी के ठेले पर, 'ये कैसा दिया रे, फ्रेश है क्या?'

चखते चखते ही, आधा पेट भर लेंगे, 

और आखिर में, पानी पुरी खा कर, निकल लेंगे,

कुछ चिंधी चटक तो, 'पूरी कडक नहीं है!'

'साले, बासा माल खिलाता है क्या ?' 

यह कह कर बेशर्म, धीरे से खिसक भी लेंगे

इन्हें शो-ऑफ करने की, होती है बिमारी,

माॅल, रेस्टॉरंट, शोरूम के भारी भरकम बिल, 

चुपचाप भूगतान करेंगे,

लेकिन गरीब सब्जी वाले से, पचास पैसे के लिए,

फिजूल बहस, घंटों करते रहेंगे,

इन्हें दूसरों की गरीबी, कभी दिखाई नहीं देती,

अपना स्वार्थ और अहंकार, इन्हें सर्वोपरी है

इसके लिए कुछ भी करने, वो सदैव तैयार है,


कुछ सामूहिक कार्य तो, वें बड़े ही कमाल से करते हैं

बहती गंगा में, ये भी हाथ धो लेते हैं

सरकारी संपत्ति तोड़ना, जलाना, लुटना

पुलिसकर्मियों पर थूकना,  ईट- पत्थर फेंकना

सैनिकों पर हाथ उठाना, इन्हें दौडाना, मारना

तिरंगे का अवमान और देश का सिर झुकाना

मामूली वजह से, मॉब लिंचिंग करते वक्त

किसी कमजोर की, मार मार कर जान लेते वक्त

इनके सिर पर, समाज सेवा का भूत सवार होता है

छोटे-बड़े, महिला-पुरुष, पिडीत, वृद्ध

इनकी किसी पर जरा भी, दया नहीं होती

सामूहिक बलात्कार करने वाले 

किसी युवती पर एसिड फेंकने वाले

ये सब के सब है, एक ही माला के मोती

कानून, व्यवस्था, समाज, का इन्हें डर नहीं होता

इससे इन्हें कोई, मतलब नहीं होता

मन से, ये‌ अंधे जो हैं!



**

शब्द मेरे, भावना मेरी।


वसंतआरबी
(कर्नल वसंत बल्लेवार)



आवाहन: यह कविता अगर हर भारतीय तक पहुंची तो समाज में कुछ बदलाव जरूर देखने मिलेगा। अगर आप इन में से एक नहीं है तो इस हास्य कविता का आनंद लें और जरूर शेयर करें। अगर आप इनमें से एक है, तो बुरा मत मानिएगा। आप के अंदर का छोटा-सा बदलाव देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान साबित होगा। देश और समाज के हित में स्वच्छ भारत अभियान तहत जारी।

सचमुच तू एक वीरांगना है

प्रेरणा: यह कविता एक सैनिक की पत्नी के जीवन से प्रेरित है, जो  सरहद पर देश की रक्षा करते हुए अपाहिज होकर, घर वापिस लौटा  है। पुरुष प्रधान समाज में बचपन से नारी हमेशा ही उपेक्षा, अपेक्षा, सम्मान, सहनशीलता और समर्पण के दायरे में मुल्यांकित होती रही हैं। एक अपाहिज हुये सैनिक की अर्धांगिनी का त्याग और समर्पण से उसपर होने वाले मानसिक तनाव एवंम समस्या का, इस शब्द रचना में उतारने का प्रयास किया है। यह कविता नारी के अदम्य साहस, संयम और सहनशीलता को दर्शाती है।

सचमुच तू एक वीरांगना है

बचपन

जब से तुम धरती पर आयी

तब से ही शुरु संग्राम तुम्हारा

मां के मन में था प्रश्न चिन्ह

मन ही मन खुश था पिता तुम्हारा


भाई बहनो में नोकझोक

हरपल भाई के हक मे जाती

गलती चाहे हो किसी की

सीख हमेशा तुझको मिलती


पढ़-लिखकर तुम क्या करोगी

हरपल तुम को सुनना पडता

सपने सपने ही रह जाते

कन्यादान तुम्हारा हो जाता


प्रथम परीक्षा


नव वधू के आगमन पर भी 

सबके मन उठता, प्रश्नचिन्ह

तेरे मन में भी उठा था अंबर

सब कुछ तू जो छोड़ के आयी

मां का आंचल, पिता का साया

सखी-सहेली, बहन और भाई

नये शहर में, नये सफर पर

नये राह में, नये मकां पर

निकल पड़ी तू  सहज अकेली

तेरे मन में था, प्रश्न चिन्ह

कौन करेगा मेरा रक्षण

पापा तो अब यहां नहीं है

कौन सुनेगा मेरी बकबक

मां भी तो अब यहां नहीं है


निकल पड़ी तू, सहज पटल पर

जैसे सैनिक, चला मिशन पर

यह तो थी तेरे जीवन की

प्रथम परीक्षा, प्रथम पराक्रम


फौजी जीवन


जन्म से ही है वीरांगना तू

मां शक्ति का रुप ही  है तू

चुन कर तूने, फौजी का दामन

देशप्रेम का, लगन दिखाया

एक सैनिक की शक्ति बनकर

वीरांगना का धर्म निभाया


जब वो जाता होगा सरहद पर

तुझपर क्या गुजरती होगी

अपने मन में उठे तूफां पर

कैसे तू संयम रखती होगी

नन्हों के मासूम प्रश्नोंका

कैसे निराकरण करती होगी


क्या है दिवाली, कैसी होली

तेरी दुनिया, अलग निराली

जब वो छूट्टी आता होगा

तभी वसंत और तभी हरीयाली

ऐसे बेमौसम बारीश में

कैसे सपने संजोती होगी


तेरे सपने, सब से अलग है

तेरी व्यथा भी, सबसे अलग है

सरहद की हर एक खबर पर 

तेरा दिल, धड़कता होगा

कैसा होगा, सैनिक मेरा

हरपल मन चिंतित रहता होगा

मेरा सैनिक वापस घर पहुंचे

सही सलामत  बस वो‌ घर पहुंचे

बस इतनी सी दुआ, तू करती होगी


वीरांगना


सैनिक की शहादत पर भी

गर्व से सीना तेरा फूलता है

दुश्मन से बदला‌ लेने की,

बच्चों को तू सीख देती है

दुश्मन से भिड़ने का जज्बा 

सीने में तू भी रखती है


जो शहीद हुआ, वो मुक्त हुआ

जीवन संघर्ष से परे हुआ

वो वीर गती को, प्राप्त हुआ

वो मातृभूमि का, हीरों हुआ

मृत्युंजयी बन वापिस लौटा जो

दुश्मन का सीना चीरकर जो

केसरिया लहरा कर लौटा जो

हॉंथ-पाॅंव खोकर लौटा जो

संघर्ष तो उसका, शुरू हुआ अब

कभी कमांडो ‌होता था जो

आज अपाहिज बना हुआ वो

उसको संयम तू देती है

एक समय का, योद्धा था जो

अब निर्भर हैं, पूरा तुझपर

उसकी जिम्मेदारी तुझपर

बच्चों की और, मात-पिता की

जिम्मेदारी, तुझपर भारी

अस्पताल और,  स्कूल-पढ़ाई,

घर, बजार और रिश्तेदारी

कैसे तू संजोती होगी

अपने ज़ख्म दिल में दफनाकर

तू सबको ढांढस देती है

धन्य है तू और तेरा जज्बा

तु सबकी एकमात्र शक्ति है

सचमुच तू एक, विरांगना है

सचमुच तू, एक विरांगना है।


वसंत आरबी
(कर्नल डॉ वसंत बल्लेवार)

आवाहन: कृपया इस कविता को नारी सम्मान में अत्यधिक शेअर करे।

ଝାରସୁଗୁଡା

 ✍ମାଧବୀ ପଟେଲ


ଝାରଜଙ୍ଗଲ ରମ୍ୟସୁନ୍ଦର

ପ୍ରକୃତି ଗନ୍ତାଘର।

ଝାରସୁଗୁଡା ନାମରେ ଜିଲ୍ଲା

ଯହିଁ ନିବାସ ମୋର।

ଅନେକ ନଦୀ ପାହାଡମାଳ

ପ୍ରପାତ,ଝର ନେଇ।

ଇବ, ସଫେଇ,ଭେଡେନ ଆଦି

ବହନ୍ତି କେତେ ନଈ।

କୁଇଲିଘୁଘର ଲାଲପଥର

ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ଭରପୁର।

ବଣଭୋଜିକୁ ଉତ୍ତମସ୍ଥାନ

ଦର୍ଶନକୁ ସୁନ୍ଦର।

ତା ଚାରିପାଖେ ମନ୍ଦିରମାନ

ଦିଶେ ଅତି ସୁନ୍ଦର।

ସହରମଧ୍ୟେ କନକଦୁର୍ଗା

କାଳିମାତା ମନ୍ଦିର।

ଝାଡେଶ୍ବର ନାମେ ପୂଜା ପାଆନ୍ତି

ଏଠି ଭୋଳାଶଙ୍କର।

ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖେ ଅବସ୍ଥାପିତ

ମାଆ ଦୁର୍ଗା ମନ୍ଦିର।

ବେହେରାମାଲ ସିଦ୍ଧେଶ୍ବରୀ ଦୁର୍ଗା

ତରିଣୀମାଁ ମନ୍ଦିର।

କାଙ୍କମାଲରେ ପୂଜାପାଆନ୍ତି

ବାବା ବାଲୁଙ୍କେଶ୍ବର।

ପ୍ରାଚୀନକାଳୁ ଜଗନ୍ନାଥ ମନ୍ଦିର

ରହିଛି ଅନ୍ତସ୍ଥଳେ।

ହନୁମାନଙ୍କ ମନ୍ଦିର ମାନ

ରହିଛି ସ୍ଥଳେ ସ୍ଥଳେ।

ଶନି ମନ୍ଦିର ଶୀତଳା ମନ୍ଦିର

ରାମ ମନ୍ଦିରମାନ|

ଅନେକଠାରେ ରାଧାକୃଷ୍ଣଂକ

ଅଛି ମନ୍ଦିର ମାନ|

ସାଇମନ୍ଦିର ହନୁମାନ ମନ୍ଦିର

ପ୍ରଭୁ ଶ୍ରୀରାମ ସଂଗେ |

ପାହାଡେଶର ମନ୍ଦିରଏକ

ରହିଛି ମଧ୍ୟଭାଗେ|

ବରଘାଟ ମନ୍ଦିର, ଚଣ୍ଡୀମନ୍ଦିର

ଇବ୍ ନଦୀର କୂଳେ।

ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଚଣ୍ଡୀ ପୂଜା ପାଆନ୍ତି

ଏକ ଗୁମ୍ଫା ଭିତରେ।

ଜଗନ୍ନାଥ ଓ ଶିବ ମନ୍ଦିର

ଲକ୍ଷ୍ମୀମାତା ମନ୍ଦିର।

ଆଖପାଖରେ ବିରାଜିଛନ୍ତି

ଆଉ କେତେ ଠାକୁର।

ଚାରିକତିରୁ ସୁରକ୍ଷାଦେଇ

କରନ୍ତି ସଂରକ୍ଷଣ।

ବିବିଧ ଧର୍ମ ସଂଗମ ଏଠି

ମିନିଭାରତ, ଜାଣ।

ଧର୍ମ ସଂସ୍କୃତି ଉର୍ଦ୍ଧରେ ଉଠି

ସଭିଙ୍କ ବାସସ୍ଥାନ।

ବନ୍ଧୁମିଳନ ପର୍ବ ପାଳନ

କରନ୍ତି ଯୋଗଦାନ।

ଶିଳ୍ପ କ୍ଷେତ୍ରରେ ସମୃଦ୍ଧ ଆଜି

ଝାରସୁଗୁଡା ଭୂଇଁ।

ବେଦାନ୍ତ,ଭୂଷଣ,ଆଦିତ୍ୟବିର୍ଲା

କାରଖାନାକୁ ପାଇ।

ସୁରେନ୍ଦ୍ରସାଏ ବିମାନ ବନ୍ଦର

ଯାତାୟତର ସେବା।

ଉନ୍ନତି ମୁଖା ଏହି ଅଞ୍ଚଳ

ଚାଲିଛି ଆଗେଇବା।

ରାଜନୀତିରେ ମନ ମନାନ୍ତର

ଏବେ କାହାରିନାହିଁ।

ଏଇ ଜିଲ୍ଲାର ଉନ୍ନତି ଲକ୍ଷ୍ୟ

ଦେଶ ହିତର ପାଇଁ।

ସାହିତ୍ୟ ପଥେ ଅନେକ ରଥି

ଅଛନ୍ତି ଅଣ୍ଟାଭିଡି।

ଝାରସୁଗୁଡା ଜିଲ୍ଲା ଆମର

ଶିଖର ଯିବ ଚଢି।

ଲକ୍ଷ୍ମୀନାରାୟଣ ମହାବିଦ୍ୟାଳୟ

ମହିଳା ବିଦ୍ୟାଳୟ।

ମନମୋହନସ୍କୁଲ ରେଲ ଷ୍ଟେସନ

ଏହାର ପରିଚୟ।

ଗୁଜାପାହାଡ ବିକ୍ରମଖୋଲ

ଇତିହାସକୁ ନେଇ।

ଉଲାପଗଡେ ଅନେକ ତଥ୍ୟ

ଦର୍ଶନ ପାର୍ଥୀପାଇଁ।

ନବ ନିର୍ମିତ ଡାକ୍ତରଖାନା 

ବିରାଟ କଳେବର।

ଜିଲ୍ଲାପାଳଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟାଳୟ

ଅତ୍ୟନ୍ତ ମନୋହର।

ଓ,ଏମ୍,ପିରେଓ ,ଏସ୍,ଏ,ପି

ସୁରକ୍ଷାରେ ତତ୍ପର।

ଝାରସୁଗୁଡା ଖେଳକୁଦରେ

ରହିଛି ଆଗଭର।

ଗିତ ନାଚ ଓ ରସରକେଲି

ଡାଲଖାଇର ତାଲେ।

ଦୁଲୁଦୁଲି ,ପର୍ବ ପାଳିତ ହୁଏ

ନୂଆବର୍ଷ ଆସିଲେ।

କେତେପ୍ରକାର ହସ୍ତ ଶିଳ୍ପର

ଏଠି ହୁଏ ପ୍ରଚାର।

ସମ୍ବଲପୁରି ବସ୍ତ୍ର ଶାଢୀର

ହୁଏ ଅତି ଆଦର।

ଭାରତସାରା ବିଭିନ୍ନପ୍ରାନ୍ତ

ଲୋକକଳାକୁ ନେଇ।

ପରିବେଷଣ ହୁଅଇ ନାଚ

ଦର୍ଶକ ଥାଏ ଚାହିଁ।

ଝାରସୁଗୁଡା ମାଟିର ଗର୍ବ

କବି ବିନୋଦ ନାୟକ।

ଏଲ୍ ,ଏନ୍, କଲେଜ କର୍ମଭୂମି

ଭେଟିଥିଲା ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ।

ଭବଭୂତି ନାମେ ମହାପୁରୁଷ

ଜନ୍ମ ଏଇ ମାଟିରେ

ଉତ୍ତର ରାମାୟଣ ରଚନାକଲେ

ନିଜ ଜ୍ଞାନ ବଳରେ|

ମିଟୁକୁଅଁର, ରତ୍ନାକରସିଂ,

ବିହାରିତନ୍ତୀ ସଂଗ୍ରାମୀ।

ଚୌହନଲାଲ ଶୀବାସ୍ତବ ପାଇଁ

ଧନ୍ୟ ହେଲା ଏ ଜମି।

ମହାଦେବ ପାଲିରେ ରାନୀଦର୍ହ

ରହିଛି ଏକ ସ୍ଥାନ।

ରାଣୀମାନେ ଇଜ୍ଜତ ହେତୁ

ଝାସିଥିଲେ ପରାଣ।

ପୂଜାରୀପାଲି ପଦ୍ମାସିନୀ ମନ୍ଦିର

ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେବୀହେଇ।

ଲୋକଙ୍କ ମନେ ବିଶ୍ବାସ ଅଛି

ଭକତ ଆସେ ଧାଇଁ।

କୁଲାବିରା ସମଲେଇମାଁ

 ନାମ ରହିଛି ଏଠି।

ବଏଲ ଯାତରା ପାଳନହୁଏ

ବହୁତ ଭିଡ ଏଠି।

ଏମାଟି ହୁଏ କେତେ ପରବ

ପୁଷପୁନି ନୂଆଖାଇ।

ଦିଆଲି ପାଇଁ ଏ ଜାଗା ବିଖ୍ୟାତ

ଦୁର୍ଗାପୂଜାକୁ ନେଇ।

ମଙ୍ଗଳ ବଜାର ପୂଜାମଣ୍ଡପ

ସରବାହାଲ ପୂଜା।

ଲକ୍ଷ କୋଟିକୁ ପହଞ୍ଚିଯାଏ

ଆଡମ୍ବରରେ ସଜା।

ରଥଯାତରା ଶିବରାତ୍ରୀ

ଅନେକ ପୂଜାପର୍ବ।

ସଭିଏଁ ମିଳି ପାଳନ୍ତି ଏଠି

ଏହା ଏଠାର ଗର୍ବ।

ଭାଇଚାରାର ମିଳନ ଏଠି

ସମସ୍ତେ ଭାରତୀୟ।

ସହଯୋଗର ହାତ ବାଟନ୍ତି

କରି କର୍ମର ଜୟ।

ଝାଡେଶ୍ବରଙ୍କ ଆଶିର୍ବାଦରେ

ସୁଖପ୍ରସୁ ଏ ଭୂଇଁ।

ତାଙ୍କ କୃପାରୁ ରୋଗ ମହାମାରୀ

ନିଶ୍ଚେ ଯିବ ଦୂରେଇ।

ମୋ ଭାରତ

✍କବିଶ୍ରୀ ଗଗନ କୁମାର ଦାଶ

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

ମୋ ଭାରତ 

ଖୋଜୁଛି ମୁଁ ତାକୁ ଆଜି

ସେ ହଜି ଯାଇଛି

ହିମାଳୟ ଗିରି ଶୃଙ୍ଗରେ

ଭାରତ ମହାସାଗର ବ‌କ୍ଷରେ

ରାଜସ୍ଥାନର ମରୂଭୂମି ପରେ ।


ଅନେକ ଖୋଜିଲି 

ସିନ୍ଧୁ ନଦୀ ତଟେ

ପୁରାତନ ସଭ୍ୟତା ଭିତରେ

ମହଞୋଦାରୋ ହରପ୍ପାରେ

ଗଙ୍ଗାର ଜଳରେ

ବ୍ରହ୍ମପୁତ୍ରର ଜଳଧାରେ

କ୍ରିଷ୍ଣା କାବେରୀ ଗୋଦାବରୀ ତଟେ

ନୀଳ ଗିରି ନୀଳ ଶିଇଳ ତଟରେ

ବିନ୍ଧ୍ୟ ଲଲାଟ ପଟରେ ।


ଅନେକ ଖୋଜିଲି

ସେ କୁଆଡେ କୋଟି ମଣିଷର ଗାନେ

ଶତ ବିହଗର ମଧୁ କଳ ଗୁଞ୍ଜରଣେ

ଝରଣାର କୁଳୁକୁଳୁ ତାନେ

ଶିଶୁର ସେ ଚପଳ ଭାଷାରେ

ତରୁଣୀ ନୟନର କୋଣେ 

ଗୋପାଙ୍ଗନା ପ୍ରିତୀ ଭରା ରାସେ

ଯମୁନାର କଦମ୍ବ କାନନେ

ଶୁଭିଥିଲା ମଧୁର ଝଙ୍କାର ।

ପରିଚୟ

✍ସନ୍ତୋଷ କୁମାର ସାହୁ


ବୁଝିପାରିଲେନି କେହି ସିନା

ମର୍ମାହତ ହୃଦୟର ଭାଷା

କିଏ କିଆଁ ଜାଣିବ ?

ହୃଦୟକୁ ଜାଳିପୋଡି

ସଂଚିଥିଲା ଯିଏ

କେତେ ଆଶା

ମମତାର ଭାଷା l


ବାସ୍ତବ ଯେ ସ୍ଵପ୍ନ ହେଲା

ଅଛିଣ୍ଡା ବି ଛିଣ୍ଡିଗଲା

ଚିହ୍ନା ପୁଣି ଅଚିହ୍ନାର ଛଦ୍ମବେଶେ

ଅଜଣାତେ ଖସିଗଲା 

ପୂର୍ଣ୍ଣତା ର ବଳୟ ରୁ

ଅପହଞ୍ଚ ସାଜିଥିଲା  l


ଅଧାଗଢା କରି ଶେଷେ

ହସି ହସି ଚାଲିଗଲା

ଗତାୟୁର ଶେଷ ଭାଗେ

ଏ ନୀରବ ନିଃସଙ୍ଗ ଜୀବନ

କିବା ତାର ଦେବ ପରିଚୟ

ସବୁ ଖାଲି 

ମିଥ୍ୟା ଆଉ ମିଥ୍ୟା l

"ଜନ୍ମଦିନ"

କାହିଁଗଲା ପଞ୍ଚଦେବ ଆବାହନ 

ସତ୍ୟପୀର ବନ୍ଦନ 

ମହୌଷଧୀ ଶୀରିଣୀର ଅଧର ଚୁମ୍ବନ... 

ଅପସରି ଗଲାଣି ମନରୁ 'ମୁକାମ'ର ଅମୃତତ୍ୱ 

ମାଡ଼ିଆସୁଛି ପୂର୍ଣ୍ଣ ପାଶ୍ଚାତ୍ୟ...... !!


ପ୍ରଣାମ ତ' ସ୍ବପ୍ନ 

ହାତଯୋଡ଼ିବାରେ ଘୋର ସଂକୋଚ 

"ହାପି ବାର୍ଥଡେ"ର ଉଚ୍ଚବାଚ... 

ଆଶୀର୍ବାଦ ଭିକ୍ଷାର ଚାହିଦା ତ' ନାହିଁ 

ଏଇ ଭିକ୍ଷା ପାଲଟେ ଅଟ୍ଟହାସ୍ୟର ସ୍ଵାକ୍ଷର.. !!


ନିର୍ବାପିତ କରାଯାଏ ବୟସର -

ଜାଜ୍ଜ୍ୱଲ୍ୟମାନ ଦୀପଶିଖା 

ନଶ୍ୱର-ଜଡ଼ମାନେ ପାଲଟିଯା'ନ୍ତି 

ଚାହିଦାର ଉପହାର..... 

ପଛରେ ପଡ଼ିଯାଏ 'ବୁଢ଼ାଟେ ହେଇଥା'ର 

ଆତ୍ମୀକ-ବଜ୍ର ଆଶିଷ.... 

ପ୍ରାଣହୀନ 'ଜନ୍ମଦିନ' ଆଜି 

ପ୍ରଦୂଷିତ କୋଳାହଳର ନାରାବାଜି... l


ଭାରି ମନେପଡ଼େ ସେଦିନ.. 

ଆଉଥରେ ଆସନ୍ତା କି'

ସେକାଳର "ଜନ୍ମଦିନ"... !!!


ପ୍ରିୟରଞ୍ଜନ ସାହୁ 
ରସୁଲଗଡ଼, ଭୁବନେଶ୍ୱର 

ଜହ୍ନ ଡାକୁଛି ଆ

ସନ୍ତୋଷ କୁମାର ସାହୁ


ସମୟ ଅପରାହ୍ନ ସାଢେ ପାଞ୍ଚଟା l ପଶ୍ଚିମ ଆକାଶରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ବୁଡିବାକୁ ବାହାରିଲାଣି ଶ୍ରାବଣୀ ତରତର ହୋଇ ଫେରୁଥିଲା ,  ସହରରୁ ଘର ଥିଲା ଆଉ ପନ୍ଦର କିଲୋମିଟର ପାଖାପାଖି ବାଟ | 

     ଆଜି କୁମାର ପୂର୍ଣ୍ଣିମା , ଦିନସାରା ଉପବାସ,ପୂଜାକରି ଭୋଗ ଖାଇବ ଶ୍ରାବଣୀ l  ଆଖିରେ ଅନେକ ସ୍ବପ୍ନ ଚେକା ମାଡ଼ି ବସିଛି l ଜରୁରୀ କାମ ଥିବାରୁ ଘରୁ ବାହାରି ଆସିଥିଲା l  ହଠାତ ସ୍କୁଟିଟି  ଅଧା ବାଟରେ ବନ୍ଦହୋଇଗଲା,  ଯେତେ ଚେଷ୍ଟା କଲେବି ଆଉ ଗାଡ଼ିଟା ଷ୍ଟାର୍ଟ ହେଲାନାହିଁ | ବାଟରେ ଯାଉଥିବା କିଛିଲୋକ ସହାୟତା କରିବାକୁ ଆସି ବିଫଳ ହୋଇ ସମବେଦନା ପ୍ରକାଶକରି ନିଜନିଜ  ବାଟଧରିଲେ |  ଆଉ କେହି ଏକୁଟିଆ ଝିଅଟିକୁ ଦେଖି କୌଣସି ଅଡ଼ୁଆରେ ନ ପଶି ବାଟ ଏଡେଇ ଚାଲିଯାଉଥିଲେ l ଦୁର୍ଯୋଗକୁ ଫୋନଟା ବି ଲାଗିଲା ନାହିଁ ,ନେଟୱାର୍କ ନ ଥିବାରୁ  l ନିରୁତ୍ସାହିତ ହୋଇ ଆଶା ଓ ଆଶଙ୍କାରେ ଭୂମିରେ ଲଥକରି ବସିପଡ଼ିଲା ଶ୍ରାବଣୀ |

      ସୌଭାଗ୍ୟବଶତଃ ସେହିବାଟଦେଇ ଫେରୁଥିଲେ ସଙ୍ଗମବାବୁ କୌଣସି ଅଫିସ୍ କାମରେ ଯାଇଥିଲେ ଦୂରଏକ ଗାଁକୁ, ଆଉ ଗାଡିର ବେଗ ବଢ଼ାଇ ଦେଇଥିଲେ ସନ୍ଧ୍ୟା ଆଗମନ ଦେଖି | ଶ୍ରାବଣୀ କାହିଁକି କେଜାଣି ହାତଟେକିଦେଲା ,ବୋଧ ହୁଏ ସାହାଯ୍ୟ ପାଇବା ଆଶାରେ ଶେଷ ଆଶ୍ରା ଭାବି | ସଙ୍ଗମ ଆଗକୁ ବଢ଼ିଯାଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ  ଅଣଦେଖାକରି ଚାଲିଯିବାକୁ ଉଚିତ ମନେକଲେନାହିଁ | 

ଆସି ପଚାରିଲେ .. ...କଣ ହେଲା ? 

   ହେଲେ ସେତେବେଳକୁ ଚିହ୍ନ୍ନି ସାରିଥିଲେ ପୁରୁଣା ଦିନର କଲେଜ ସାଥି ଶ୍ରାବଣୀକୁ | 

ଆରେ ତୁମେ ଶ୍ରାବଣୀ ନା ?

 ହଠାତ୍ ଏଠି ? 

ଶ୍ରାବଣୀ ଠିକ ଠଉରେଇପାରିଥିଲା ଜୀବନ ପାଇଲା ଭଳି ଚମକି ଉଠି କହିଲା ହଁ.. ହଁ.. | 

କୁଆଡେ ଯାଇଥିଲ ?

ତମେ ସଙ୍ଗମ ତ l 

ଗାଡ଼ିଟା ଷ୍ଟାର୍ଟ ହେଉନାହିଁ, ଚୁମ୍ବକରେ କହିଗଲା ଶ୍ରାବଣୀ ଆରମ୍ଭରୁ ଶେଷ ଯାଏ | ଏ ମଧ୍ୟରେ ସଙ୍ଗମ ଗାଡିକୁ ସଜାଡ଼ିବା ପାଇଁ ପ୍ରୟାସ ଜାରି କରି ସାରିଥିଲେ | କିନ୍ତୁ ସଫଳ ହେଲେନାହିଁ | ସେତବେଳକୁ ମୁହଁ ସଞ୍ଜ ହେଇଗଲାଣି | ଧୀରେ ଧୀରେ ଜଙ୍ଗଲିଆ ରାସ୍ତାଟି ନିଛାଟିଆ ହେଇପଡିଲା | ସେଠାରେ ବେଶୀ ସମୟ ରହିବା ନିରାପଦ ନଭାବି ସଙ୍ଗମ କହିଲା ଏଠି ବେଶୀ ସମୟ ରହିବା ଠିକ  ନୁହେଁ | 

ସେହି ସମୟରେ ସେହି ବାଟ ଦେଇ ଯାଉଥିବା ଲୋକଟିଏ କହିଲା ଆଂଜ୍ଞା ପାଖ ଗାଁରେ କହ୍ନେଇ ଭାଇର ଛୋଟ ଗ୍ୟାରେଜଟିଏ ଅଛି | ସେଇଠିକି ନେଇଯାନ୍ତୁ ,ସେ ସଜାଡି ଦେଇପାରିବ | 

         ସଙ୍ଗମ କହିଲେ ଦେଖ ଶ୍ରାବଣୀ.. ତୁମକୁ ଏକୁଟିଆ ଏଠାରେ ଛାଡି ମେକାନିକ ପାଖକୁ ଯିବା ମୁଁ ଉଚିତ ମଣୁନାହିଁ | ତା ପରେ ସନ୍ଦେହ, ସେ ଏଠାକୁ ଆସିବ କି ନାହିଁ | ଚାଲ ସେଠାକୁ ଯାଇ ଚେଷ୍ଟା କରିବା | ଏହା କହି ଗାଡି ଷ୍ଟାର୍ଟ କଲା | ଶ୍ରାବଣୀ କିଛି ନକହି ଗାଡ଼ିରେ ଯାଇ ବସି ପଡିଲା |

     ଦୁହେଁ ଯାଇ ଅନୁସନ୍ଧାନ କରି କହ୍ନେଇ ଭାଇ ଦୋକାନ ପାଖରେ ପହଂଚି ଗଲେ |  ସେତବେଳକୁ ସେ ଦୋକାନ ବନ୍ଦ କରୁଥିଲା | ସଂଗମଙ୍କ କଥା ଶୁଣି କହିଲା ଆଂଜ୍ଞା ମୁଁ ସେଠାକୁ ଯାଇ ସଜାଡି ପାରିବିନି | ଏଠାକୁ ଆଣିଲେ ଠିକ କରିଦେବି |  ମେକାନିକ କଥା ଶୁଣି ଶ୍ରାବଣୀ ବ୍ୟତିବ୍ୟସ୍ତ ହେଇପଡିଲା | ମେକାନିକ ଦୁହିଁଙ୍କର ଅବସ୍ଥା ଅନୁମାନ କରି କହିଲା ହଉ ଠିକ ଅଛି ମା, ମୋ ଘରଟି ମୋ ଦୋକାନକୁ ଲାଗିଛି | ତୁମେ ଏଠାରେ ଆମ ପିଲା ମାନଙ୍କ ସହିତ ବସିଥାଅ | ମୁଁ ଯାଉଛି ଦଉଡ଼ି ଟିଏ ଆଣୁଛି | ଗାଡ଼ିଟିକୁ ବାନ୍ଧି ଆଣିବା | କଥା କଣ କି, ମୁଁ ବୁଢା ଲୋକ | ସେଥିପାଇଁ ଅମଙ୍ଗ ହେଉଥିଲି | ସଙ୍ଗମ ବାବୁଙ୍କ ସହିତ କହ୍ନେଇ ବାହାରିଗଲା ଗାଡି ଆଣିବାକୁ |

  ଏପଟେ ଶ୍ରାବଣୀ ଘର ପିଣ୍ଢାରେ  ବସିପଡିଲା | ସେଦିନ କୁମାର ପୁର୍ଣିମାଥିବାରୁ, ଝିଅ ମାନେ ତୁଳସୀ ଚଉରା ମୂଳେ ଚାନ୍ଦପୂଜା କରୁଥିଲେ | ଶ୍ରାବଣୀ ମନେପକାଉଥିଲା ନିଜ ଘର କଥା | କେମିତି ଘରକୁ ଫେରିବ ଵ୍ୟସ୍ତବିବ୍ରତ ହୋଇଯାଉଥିଲା | ପ୍ରାୟ ଅଧଘଣ୍ଟା ପରେ ସଙ୍ଗମବାବୁ ଗାଡିନେଇ ଫେରିଲେ | ମେକାନିକ ଗାଡି ଖୋଲି କାମ ଆରମ୍ଭ କରିଦେଲା | 

      ସଙ୍ଗମ ଯାଇ ପାଖ ଖଟିଆରେ ବସି ପଡିଲେ | ପାଖରେ ହୁଳହୁଳି ଓ ବନ୍ଦାପନା ରେ ଅଗଣା ପୁରିଉଠୁଥିଲା | ସେପଟେ ଆକାଶରେ ପୂର୍ଣ୍ଣିମାଚନ୍ଦ୍ର ଉଙ୍କି ମାରି ହସି ଉଠୁଥିଲେ | କିନ୍ତୁ ଶ୍ରାବଣୀ କୁ ତାହା ବିଦ୍ରୁପ ପରି ଲାଗୁଥିଲା | ଦୁହେଁ ଅନ୍ୟମନସ୍କ ହୋଇପଡିଥିଲେ କିଛି କ୍ଷଣ ପାଇଁ | 

+  +    +    +   +    +    +     +

   ସେଦିନ ଠିକ ସେମିତି ଏକ ଅପାଶୋରା ମୁହୂର୍ତ୍ତ ଥିଲା | ଦୁହେଁ ଦୁହିଁଙ୍କ ଠାରୁ ଅଲଗା ହୋଇଯାଇଥିଲେ ଭିନ୍ନ ଏକ କାରଣକୁ ନେଇ | ଉଭୟଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଭଲ ପାଇବା ଥିଲା | କିନ୍ତୁ କେହି ପ୍ରକାଶ କରିନଥିଲେ | ଦୁହେଁ ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ରାସ୍ତାରେ ଚାଲିଯାଇଥିଲେ | ଆଜି ଯଦିବା ପୂର୍ବଦିନର କଥାକୁ ଲେଉଟାଇବାକୁ ଚାହୁଁନଥିଲେ | ଖାଲି ପୂର୍ବ ଅତୀତକୁ ରୋମନ୍ଥନ କରିଚାଲିଥିଲେ | ଏକା ଏକା ନକ୍ଷତ୍ର ପରି l

+    +    +     +   +   +  +  +  +

  ହଠାତ ଦୁହିଁଙ୍କର ଧ୍ୟାନଭଗ୍ନ ହେଲା  କହ୍ନେଇ ମେକାନିକ କଥାରେ | ଆଂଜ୍ଞା ଠିକ ହୋଇଗଲା | ଶ୍ରାବଣୀ ଖୁସିରେ ପର୍ସରୁ ଟଙ୍କା କାଢୁଥିଲା , କହ୍ନେଇ ବାଧାଦେଇ କହିଲା ଆଂଜ୍ଞା ପଛରେ ଦେବେ | 

  ଆପଣ ଏବେ ଯିବା କଥା ଭାବୁଚନ୍ତିକି ? 

ସମୟ ଦଶଟା ହେଲାଣି,ଏ ରାସ୍ତା ମୋଟେ ଭଲ ନୁହେଁ | ଗାଡ଼ିଟା ଏବେ ସଜଡା ହୋଇଛି , ତାଛଡା ବାଟରେ ଯଦି ପୁଣି କିଛି......| 

     ଶ୍ରାବଣୀ ବ୍ୟସ୍ତ ହୋଇ ପଡିଲା | ସଙ୍ଗମ ବି କିଛି ଭାବି ପାରୁନଥିଲେ କଣ କରିବେ | ଦୁହେଁ ଉଭୟ ପୂର୍ବ ପରିଚିତ ନ ଥିଲେବି ବର୍ତମାନ ନୂଆ , କାହାକୁ କଣ କହିବେ ? 

   କହ୍ନେଇ କହିଲା ବାବୁ ମୁଁ କାମ ଡେରି ହେବ ଜାଣି ଘରେ କହିଦେଇଥିଲି ରୋଷାଇ କରିଦେବାପାଇଁ |  ଗରିବ ଲୋକ , ଛୋଟ ଘର, ଦୋକାନରେ ଯାହା ଦୁଇପଇସା ରୋଜଗାର ହୁଏ ପରିବାର ଚଳାଏ | ଝିଅଟିକୁ  କଷ୍ଟେମଷ୍ଟେ କଲେଜରେ ପଢାଉଛି | ଆମର ଛୋଟିଆ ଅଲଗା ରୁମଟିଏ ଅଛି | ରାତିଟା ରହିଯିବେ ,ସକାଳ ହେଲେ ଉଠି ଚାଲିଯିବେ | ଏବେ ମନକୁ ପାପ ଛୁଉଁଚି ,କେତେବେଳେ କୋଉ କଥା ..... ରାତିଟା ରହିଯାନ୍ତୁ ......l

ଠିକ ସେତିକିବେଳେ ଝିଅ କୁଆଁରପୁନେଇ ଭୋଗ ବଢ଼ାଇ ଦେଇ  କହିଲା ଆଂଜ୍ଞା ମୁଁ ରୁମ ସଜାଡ଼ିଦେଇଛି , ଆସନ୍ତୁ ଯିବା | ଅଗତ୍ୟା ଆଉ କୌଣସି ଚାରା ନଥିଲା, ଦୁହେଁ ହାତ ଧୋଇ ଭୋଗ ଗ୍ରହଣ କଲେ | ଆତ୍ମ ତୃପ୍ତି ଅନୁଭବ କଲେ l

ଜହ୍ନ ମୁଣ୍ଡ ଉପରକୁ ଉଠି ଯାଇଥିଲା ,ଧଳା ମେଘ ଉହାଡରେ ଲୁଚକାଳି ଖେଳି ଖିଲ ଖିଲ ହସୁଥିଲା ଦୁହିଁଙ୍କୁ  ଦେଖି |ମନେ ହେଉଥିଲା ସତେ ଯେମିତି ଆଜିର ଜହ୍ନ ରାତି ତାଙ୍କ ଦୁହିଁ ଙ୍କ ପାଇଁ ଅପେକ୍ଷା କରିରହିଥିଲା କାହିଁ କେତେ କାଳରୁ l

   ତାପରେ ଦିଜଣ ଯାକ ରାତ୍ରି ଭୋଜନ କଲେ | କହ୍ନେଇଙ୍କ ସ୍ତ୍ରୀ କହିଲେ ବାବୁ କଣ ଦିଟା ରାନ୍ଧିଦେଇଛି ସୁଆଦ ଅସୁଆଦ କଣ ଜାଣିନାହିଁ | କିଛି ଭାବିବେ ନାହିଁ , ଚଳେଇନେବେ | 

ଶ୍ରାବଣୀ କହିଲା ଆରେ ନା  ନା, ବହୁତ ଭଲ ହୋଇଛି ମାଉସୀ | ସବୁବେଳେ କଣ ସମାନ ଖାଦ୍ୟ ମିଳେ, ତାଛଡା ଆମ ପାଇଁ ବହୁତ ସୁନ୍ଦର ଓ ସୁସ୍ୱାଦୁ କରି ରାନ୍ଧିଛନ୍ତି | ଉଭୟ ଖାଇସାରି ହାତ ପଖାଳି ଶୋଇବାକୁ ଗଲେ | ହେଲେ ନିଦ ଆସୁଛି କୋଉଠି ? 

  ଦୁଇ ପରିଚିତ ଅତ୍ମା ଯଦିଓ ନୂଆ ଏକ ପରିସ୍ଥିତିକୁ ସାମ୍ନା କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ନଥିଲେ | ପରସ୍ପର ଗଲା ଦିନର କାହାଣୀ ବର୍ଣନା କରି ଖୁସି ହେଉଥିଲେ ଏବଂ କହ୍ନେଇ ର ପରିବାରକୁ ଧନ୍ୟବାଦ ଦେଉଥିଲେ | ସେଇଠି ବସି ବସି ଢୁଳେଇ ପଡ଼ିଥିଲେ | 

ସକାଳୁ କୁକୁଡ଼ା ଡାକରେ ନିଦ ଭାଙ୍ଗିଗଲା | ଉଠି ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେଉଥିଲେ | ବଡ଼ି ଭୋର, ସମସ୍ତେ ବି ଉଠି ପଡ଼ିଥିଲେ  ଝିଅ ଡିକାସିନି ଚା ଧରି ଠିଆ ହୋଇଥିଲା | ଚା ଟା ପିଇସାରି ଶ୍ରାବଣୀ କହ୍ନେଇଙ୍କ ହାତକୁ ବଢ଼ାଇ ଦେଲା ପାଞ୍ଚଶହ ଟଙ୍କିଆ ଦୁଇ ଖଣ୍ଡ ନୋଟ | କହ୍ନେଇ କହିଲେ ଏତେ କଣ ? ନା ନା.. ମୋର ପ୍ରାପ୍ୟ ନୁହେଁ, ଯଦି ଦେବେ, ମୋତେ ଶହେଟଙ୍କା ମାତ୍ର ଦିଅନ୍ତୁ | ସଙ୍ଗମ କହି ଉଠିଲେ , ଆପଣଙ୍କର ପ୍ରାପ୍ୟ ଆମେ କଣ ଦେଇ ପାରିବୁ | ସେତ ଅମୂଲ ମୂଲ, ଖୁସିରେ ଦେଉଛୁ ରଖନ୍ତୁ | ଆପଣ ମାନବିକତାର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନିଦର୍ଶନ ଦେଖାଇଛନ୍ତି | ଏହାକହି ଝିଅ ହାତରେ ଟଙ୍କା ଗୁଞ୍ଜି ଦେଇ ବାହାରି ପଡିଲେ | 

ଗାଁ ମୁଣ୍ଡକୁ ଆସି ପରସ୍ପର ବିଦାୟ ନେବା ପାଇଁ ଯାଉଥିଲେ | ଶ୍ରାବଣୀ କିପରି ଭାବରେ ଧନ୍ୟବାଦ ଦେବ ଜାଣିପାରୁନଥିଲା | ଜହ୍ନ ଧୀରେ ଧୀରେ ପଶ୍ଚିମ ଆକାଶରେଅସ୍ପଷ୍ଟ ଦେଖା ଯାଉଥିଲେ, ହାତଠାରି ଡାକୁଥିଲେ ଆ...... ଆ...... | ଶ୍ରାବଣୀ ପାଇଯାଇଥିଲା ମନର ରାଜ କୁମାର ଆଉ ସଂଗମ ହାତ ବଢାଇଥିଲେ କରମର୍ଦନ ପାଇଁ ; ସମ୍ପର୍କ ମଜବୁତ ହେଉଥିଲା |ଦୁଇ ହାତ ପରସ୍ପର ଠାରୁ ବିଚ୍ଛେଦ ହେବାକୁ ଅମଙ୍ଗ lଅପଲକ ନେତ୍ରରେ ଦୁହେଁ ଦୁହିଁକୁ ଚାହିଁ ରହିଥିଲେ l ଧୀରେ ଧୀରେ ଅପ୍ରସ୍ତୁତ ହାତ ହୁଗୁଳାଇ ନେଲେ ଲାଜରେ l  ହସି ହସି ଜହ୍ନକୁ ଧନ୍ୟବାଦ ଦେଇ ବାହାରି ପଡିଲେ ଉଭୟ ନିଜ ନିଜର ଗନ୍ତବ୍ୟ  ସ୍ଥାନକୁ ,ମନ କିନ୍ତୁ ଜହ୍ନ ରାଇଜରେ ଉଡ଼ିବୁଲୁଥିଲା ସାଥିର ଉଷ୍ମ ଚୁମ୍ବନ କୁ  ନେଇ l

_________

ନବରଙ୍ଗପୁର

Wednesday, November 11, 2020

କବିଙ୍କୁ ପଦେ

✍ବୈଷ୍ଣବ ଚରଣ ଦାଶ

ବନ୍ଦ କର ହେ କବି,

ତୁମର ସେ ପ୍ରିୟତମା, ପ୍ରାଣେଶ୍ୱରୀ ଛନ୍ଦ।

ଶୁଣି ଶୁଣି ବଧିର ହେଲୁଣି।

ଶୁଣିବାରେ ନାହିଁ ଧୈର୍ଯ୍ୟ କି ଅବକାଶ।


ତୁମେ ଯେ ସ୍ୱପ୍ନାଭିଭୂତ,

ତେଣୁ ହେଉଛ ଚକିତ।

ଯେଉଁ ସ୍ୱପ୍ନରେ ବାସ୍ତବତା ନାହିଁ

ସେ ସ୍ବପ୍ନ ସବୁ ଦେଖ କାହାପାଇଁ?


ହେ କବି! ଏ ଜହ୍ନ କୁ ଦେଖ

ତାକୁ ଦେଖିପରା କବିତା ଲେଖ।

ମନେରଖ! ସେ ସ୍ବପ୍ନ ର ଜହ୍ନ ଏକ,

ଯହିଁ ରେ ଲାଗିଛି କଳଙ୍କ।

ତାକୁ ଭାବି ପରୀ ରାଇଜ ର

ସ୍ବପ୍ନ ନ ଦେଖ।


ଯାହାକୁ ତୁମେ ଅନିନ୍ଦ୍ୟ ଭାବୁଛ

ସେ ଏକ ଅଦୃଶ୍ୟ ନିହାରିକା।

ଯାହା ତ କରିଛ କରିଛ।

ଏବେ କିନ୍ତୁ ବାସ୍ତବକୁ ଚାହିଁ

ତୁମ ଲେଖନୀ କୁ

କରିବ ଚାଳିତ।


ଦେଖ ଏଠି ଆମେ

କେତେ ଯେ କୁତ୍ସିତ।

ଖଣ୍ଡିଏ ରୁଟି ପାଇଁ

ଡହଳ ବିକଳ ହେଉଥିବା ମଣିଷ।

କିପରି ବୁଝିବୁ ତୁମ କବିତାର ମର୍ମ?


ବୀର ଧନଞ୍ଜୟ ପୁର
ବୁଗୁଡ଼ା ଗଞ୍ଜାମ

ହଜିଲା ଶୈଶବ

  ✍ବାସନ୍ତୀ ଲତା ଜେନା 


ପିଲା ଦିନ ମୋର ହଜିତ ଯାଇଛି 

        ଆଜି ଖୋଜି ପାଉ ନାହିଁ 

ଅତୀତର ସ୍ମୃତି ହୃଦେ ସାଇତା ମୋ 

        ମନେ ପଡେ ରହି ରହି      ll 


ମା'ର ପରଶ ସ୍ନେହର ଆଶିଷ 

       କେତେ ଅଳି କରୁ ଥିଲି 

ବାପାଙ୍କ ପାଖରୁ ଗାଳି ଖାଉ ଥିଲେ 

        ମାଆ ନେଉ ଥିଲେ ତୋଳି  ll 


ସାରା ଖରା ବେଳ ଖେଳେ କଟୁ ଥିଲା 

          ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଖେଳ ସାଥେ 

ବହୂ ଚୋରି ଖେଳ ଖପରା ଡିଆଁ ଯେ 

         କେଲି ବାଡି ବାଟି ସାଥେ   ll 


ଆମ୍ଭୁଲ ଆଚାର ଘରୁ ନେଉ ଥିଲୁ 

       ମା'କୁ ଲୁଚାଇ କରି 

ସାଙ୍ଗ ସାଥି ମିଶି ବାଣ୍ଟି ଖାଉ ଥିଲୁ 

       ମଜ୍ଜା ଲାଗୁଥିଲା ଭାରି     ll 


କଞ୍ଚା ଆମ୍ବ ସାଥେ ଲୁଣ ଲଙ୍କା ଦେଇ 

        ଖାଉ ଥିଲୁ ମନ ଭରି 

ଖଜୁରୀ ପିଜୁଳି କେତେ ଖାଉ ଥିଲୁ 

            ବାଡ଼ିରେ ବିଛାଇ କରି    ll 


ଝିପି ଝିପି ବର୍ଷା ଭିଜିବାକୁ ମଜ୍ଜା 

        ଗାଁ ସାଥି ପିଲା ମେଳେ 

ବାଡ଼ି ଧରି କରି ଜେଜେ ମା ଗୋଡ଼ାନ୍ତି 

       ସର୍ଦ୍ଦି କାଶ ହେବ କାଳେ    ll 


ସନ୍ଧ୍ୟାରେ ବସି ମୁଁ ପାଠ ପଢୁ ଥିଲି 

         ନିଦ ଆସୁ ଥିଲା ଘାରି 

ମା କହୁ ଥିଲେ ପଢା ସାରି ଦିଅ 

          ଶୋଇ ଯାଅ ଖାଇ କରି    ll


ଚିନ୍ତା ତ ନ ଥିଲା ଦୁଃଖ ବି ନଥିଲା 

        ନ ଥିଲା ଜଞ୍ଜାଳ କିଛି 

ବଡ଼ ହୋଇ ଆଜି ଜଞ୍ଜାଳେ ଫସିଛି 

         ଶୈଶବ ହଜି ଯାଇଛି     ll 


ବାସନ୍ତୀ ଲତା ଜେନା, ଗାନ୍ଧିନଗର, ନବରଙ୍ଗପୁର  l

ସେଦିନ ସନ୍ଧ୍ୟା ରେ........

 ✍ସୁଧାଂଶୁ କୁମାର ତ୍ରିପାଠୀ


***********

ନୂଆ ନୂଆ ସହରକୁ ଆସିଥାଏ , ପୁର୍ତ୍ତ ବିଭାଗରେ ଚାକିରୀ ଖଣ୍ଡେ ପାଇବାରୁ ଗାଁ ଛାଡି ଆସିବାକୁ ପଡିଲା। ଗାଁ ଠୁ ସହର ପ୍ରାୟ ତିରିଶ ମାଇଲ ବାଟ,ସବୁଦିନେ ଯିବାଆସିବା କରିବା ଟା ସମ୍ଭବ ହବନି ବୋଲି ବାପା ଙ୍କ ଠୁ ଅନୁମତି ନେଇ ଆସିବାକୁ ପଡିଲା ସହରକୁ। ନୂଆ ଜାଗା,ନୂଆ ଲୋକ, ସହର ପାଣିପାବନ ସହ ଖପାଖୁଆଇ ଚାଲିବାକୁ ପଡିବ। ଅବିବାହିତ ଯୁବକ ପିଲାଙ୍କୁ ସହରରେ ଘର ଖଣ୍ଡେ ପାଇବା ଟା ଯେ କେତେ କଷ୍ଟ ସେକଥା ଯିଏ ଅନୁଭବ କରିଥିବ ସେ ହିଁ ବୁଝିପାରିବ। ବହୁ କଷ୍ଟରେ ଘର ଖଣ୍ଡେ ମିଳିଲା, ଗୋଟିଏ ବଖରା ସାଙ୍ଗକୁ ବାରଣ୍ଡା ଟିଏ , ଏକୁଟିଆ ଲୋକ ତ ଚଳିଯିବ ଭାବିକି ରହିଲି। ପ୍ରତିଦିନ ସକାଳୁ ବସ ଯୋଗେ ଅଫିସ କୁ ଯିବାକୁ ପଡେ । 

   ସେଦିନ ଝିପିଝିପି ବର୍ଷା ସାଙ୍ଗକୁ ହଲକା ପବନ ହଉଥାଏ। ଅଫିସ ରୁ ବହାରିକି ଟାଉନ ବସ କୁ ଅପେକ୍ଷା କରିଥାଏ। ସନ୍ଧ୍ୟା ହେଇଗଲାଣି ଅଫିସ ଠୁ ଘର ପ୍ରାୟ ତିନି କିଲୋମିଟର ,ବର୍ଷା ହୋଉନଥିଲେ ଚାଲିକି ପଳେଇଯାନ୍ତି । ବର୍ଷା ଲାଗି କୌଣସି ବସ ବି ଆସୁନଥାଏ। ଭାବିଲି ଆଉ ଅପେକ୍ଷା କରିବା ଠିକ ହବନି ବର୍ଷା ର ମାତ୍ର ବି କମିଗଲାଣି । ପ୍ୟାଣ୍ଟ ଟାକୁ ଟିକିଏ ଭାଙ୍ଗ କରିଦେଇ ରାସ୍ତାର କଡେ କଡେ ଚାଲିଲି। ସନ୍ଧ୍ୟା ସମୟ ସହର ଆଲୋକିତ , କିଛି ବାଟ ଯିବା ପରେ ବର୍ଷା ପୁଣି ଜୋର ହେଲା , ଭାବିଲି ଏମିତି ଆଉ ଭିଜିକି ଗଲେ ହବନି କୋଉଠି ଟିକେ ରହିଯିବି। ଦେଖିଲି ଆଗରେ ଗୋଟିଏଯାତ୍ରୀ ବିଶ୍ରାମ ଗାର ଅଛି , ସେଠି ଯାଇ ପହଂଚିଲି। ବର୍ଷା ଜୋର ହଉଥାଏ , ଯାଇ ଦେଖେ ତ ଜଣେ ସୁନ୍ଦର ଯୁବତୀ ବସିଛନ୍ତି ସେଠି। ବୋଧେ ବର୍ଷା ପାଇଁ ସେ ବି ଏଠି ଅଟକିଯାଇଛନ୍ତି। ନିଜ ପକେଟ ରୁ ରୁମାଲ ଟା ବାହାର କଲି ଦେଖିଲି ସେଇଟା ବି ଭିଜି ଯାଇଛି। ତଥାପି ଓଦା ରୁମାଲ ରେ ମୁଂହ ପୋଛିଲି । ବର୍ଷା ର ମାତ୍ର ବେଳକୁ ବେଳ ବଢିଚାଲିଲା। ନିରବ ଭାବରେ ସିମେଣ୍ଟ ବେଞ୍ଚ ଉପରେ ବସିଲି , ମୋ ଅପର ପାର୍ଶ୍ୱ ରେ ସେ ସୁନ୍ଦରୀ ଯୁବତୀ ଜଣଙ୍କ ବସିଥାନ୍ତି। ତାଙ୍କ ମୁଖ ମଣ୍ଡଳକୁ ଦେଖିଲେ ଲାଗୁଥିଲା ସେ ଯେମିତି ବିବ୍ରତ ଅଛନ୍ତି। ପର୍ଶ୍ୱସ୍ଥ ନୀରବତା କୁ ଭାଙ୍ଗ କରି ପଚାରିଲି "କଣ ହେଇଛି ଆପଣ ଵ୍ୟସ୍ତ ଜଣାପଡୁଛନ୍ତି"? ....ମୋର ପ୍ରଶ୍ନ ରେ ସେ ବି ନୀରବତା ଭଙ୍ଗ କରି କହିଲେ "ଆଜି ଅଫିସ ରୁ ଫେରିବା ଟିକିଏ ବିଳମ୍ବ ହେଇଗଲା ସେଥିପାଇଁ ବସ ପାଇଲିନି। " 

ମୁ କହିଲି ତାହାଲେ ପରବର୍ତ୍ତୀ ବସ ଆସିଵା ଯାଏ ଅପେକ୍ଷା କରନ୍ତୁ।

ସେ କହିଲେ ସନ୍ଧ୍ୟା ସମୟରେ ଆମ ଗାଁ କୁ କେବଳ ଗୋଟିଏ ବସ। 

ତୁମ ଗାଁ ଏଠୁ କେତେ ବାଟ ହବକି"ମୁ ପଚାରିଲି।

ସେ କହିଲେ ପ୍ରାୟ ଚାଳିଶ କିଲୋମିଟର ଠୁ ଅଧିକ ହେବ।

ମୁ କହିଲି " ତାହାଲେ ଏଠି କେହି ସମ୍ପର୍କୀୟ ଙ୍କ ଘରେ ରହିଯାଅନ୍ତୁ।"

ମୋ ଠୁ ଏହା ଶୁଣିବା ପରେ ସେ କହିଲେ ଆମର ସମ୍ପର୍କୀୟ ବୋଲି କେହି ନାହାନ୍ତି, ଘରେ ମୁ ଅଉ ମୋ ବାପା ଆମେ ଦୁହେଁ ରହୁଛୁ। ମୁ ଛୋଟ ଥିଲି ମୋ ମା ଚାଲିଯାଇଛନ୍ତି। ଏତିକି କହି ଯୁବତୀ ଜଣଙ୍କ କାନ୍ଦିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

ମୁ କହିଲି ହୋଉ ତାହାଲେ ବ୍ୟସ୍ତ ହବା କିଛି ଦରକାର ନାହିଁ। ମୁ ଗୋଟିଏ ଟାକ୍ସି ଡାକିଦଉଛି ସେଥିରେ ଆପଣ ଚାଲିଯିବେ।

ଯୁବତୀ ଜଣଙ୍କ କହିଲେ ଟାକ୍ସି ରେ ଯିବାକୁ ମୋର କିଛି ଅସୁବିଧା ନାହିଁ ଯେ , ଆମ ଗାଁ କୁ ଯିବା ବାଟରେ ଜଙ୍ଗଲ ରାସ୍ତା ଦେଇ ଯିବାକୁ ପଡେ । ମୁ ଏକୁଟିଆ ଯଦି ଟାକ୍ସି ରେ ଯାଏ ତାହାଲେ.......

ମୁ ବି ସେଇଆ ଭାବିଲି ଆଜି କାଲୀ କା ସମୟ ଭଲ ନୁହଁ , ଏକୁଟିଆ ଛାଡିବା ଠିକ ହବନି।

ଯୁବତୀ ଜଣଙ୍କ ଚିନ୍ତା ରେ ବୁଡି ରହିଲେ।

ମୁ କହିଲି ଦେଖନ୍ତୁ ଆପଣ ଯଦି ଖରାପ ନଭାବିବେ ତାହାଲେ ମୁ ଗୋଟେ ପ୍ରସ୍ତାବ ଦେବୀ।

କୁହନ୍ତୁ.... ସେ କହିଲେ

ଆପଣ ଯଦି ମୋ ଘରେ ଆଜି ରାତିଟା ଚଳି ଯାଆନ୍ତେ ତାହାଲେ କିଛି ଅସୁବିଧା ହେବକି?

ଏମିତି ପଚାରି ଥିବାରୁ ମତେ ନିଜକୁ ବହୁତ ଖରାପ ଲାଗୁଥିଲା।

କେଜାଣି ଯୁବତୀ ଜଣଙ୍କ କଣ ଭାବୁଥିବେ।

ଏମିତି ସମୟରେ ସେ କହିଲେ ଆପଣ କୋଉଠି ରୁହନ୍ତି। କିଏ କିଏ ରୁହନ୍ତି ଆପଣଙ୍କ ସହ?

ଏଇ ଅଳ୍ପ ଦୂରରେ ମୋ ଘର, ମୁ ଏକୁଟିଆ ରୁହେ। 

ଏକୁଟିଆ ରହିବା କଥା ଶୁଣି ସେ ଟିକିଏ ବିଚଳିତ ଲାଗିଲେ।

ଆପଣ ଜମା ଭୟ କରନ୍ତୁନି ମୋ ଘରେ ଆପଣ ପୁରା ନିରାପଦ। ମୁ  କହିଲି

ମୋ କଥା ଶୁଣି ଯୁବତୀ ଜଣଙ୍କ ମୋ ସହ ଯିବାକୁ ରାଜି ହେଲେ।........

ବର୍ଷା ସେତେବଲକୁ  କମି ଯାଇଥାଏ, ସମୟ ଆଠ ଟା ବାଯିବାକୁ ବସିଲାଣି ଦୁହେଁ ବାହାରିଲୁ । 

  ବର୍ଷା ସିନା ଛାଡ଼ିଥାଏ କିନ୍ତୁ ପବନ ଟିକିଏ ଟିକିଏ ହଉଥାଏ। ଦୁହେଁ ପାଦ ଚଞ୍ଚଳ କରି ଚାଲିଲୁ। ଯିବା ବାଟରେ ପଚାରିଲି ତୁମ ନା ଟା କଣ ,? .......

ପ୍ରିୟଙ୍କା ମୋ ନାଁ ଯୁବତୀ ଜଣକ କହିଲେ। 

ଅବିନାଶ ମୋ ନାଁ , ମୁ କହିଲି।

ଦୁହେଁ ସାଢ଼େ ଆଠଟା ସୁଦ୍ଧା ଘରେ ପହଂଚି ସାରିଥିଲୁ। ସହର ସିନା ବର୍ଷା ରାତି ଲାଗି ନିଶବ୍ଦ ଲାଗୁଥାଏ। 

ଘର ଚାବି ଖୋଲି ଭିତରକୁ ଗଲୁ , ବଲବ ସୁଇଚ ଲଗେଇଲି।ଗୋଟାଏ ବଖରା ଘର, ଛୋଟ ଖଟ ଟିଏ ପଡିଛି। ଯୁବତୀ ଜଣକୁ କହିଲି ଏଥିରେ ଟିକିଏ ଚଳେଇଦେବେ ଆଜି ରାତିକ।

ସେ ମୁଣ୍ଡ ହଲେଇ ହଁ କଲେ।  ସେ ଟିକିଏ ବର୍ଷା ରେ ଭିଜି ଯାଇଥାନ୍ତି ତାଙ୍କ ପୋଷାକ ବି ଓଦା ଓଦା ଲାଗୁଥିଲା, ମୋର ହଳେ ଟ୍ରାଉଜର ତାଙ୍କୁ ଦେଲି ବଦଳେଇବା ପାଇଁ,ମୋ ପୋଷାକ ବି ଭିଜି ଯାଇଥାଏ , ତଉଲିଆ ଟେ ନେଇ ବାରଣ୍ଡା ରେ ବଦଳେଇ ଆସିଲି। .......  

ରାତି ପାଖା ପାଖି ନଅଟା ବାଜିଲାଣି, ରୋଷେଇ କରିବା ପାଈଁ ମୁ ବାହାରିଲି। ଯୁବତୀ ଜଣକ କହିଲେ ଆପଣ ରୁହନ୍ତୁ ମୁ ରୋଷେଇ କରିଦଉଛି। ......ମୁ ମନା କଲି ଆପଣ ଆଜି ଅତିଥି ମୋ ଘରେ କାହିଁକି ଆପଣ ରୋଷେଇ କରିବେ , ମୁ କରିଦଉଛି। ଶୁଣିଲେଣି ଦୁହେଁ ମିଶିକି ରୋଷେଇ କଲୁ। 

ରାତି ପ୍ରାୟ ଦଶଟା ହେଇଯାଇଥାଏ ରୋଷେଇ ସରିଲା, ଦୁହେଁ ସାମ୍ନା ସାମ୍ନି ବସିଲୁ ଖାଇବା ପାଇଁ। ......ମୁ ଖାଇବା ସମୟରେ ଲକ୍ଷ୍ୟ କଲି ସେ ମତେ ଦେଖୁଛନ୍ତି, ମୁ ପଚାରିଲି କିଛି ଅସୁବିଧା ହେଲାକି, ସେ କହିଲେ ନାହିଁ। ଶ୍ୟାମଳ ବର୍ଣ ଶରୀର ଉପରେ ମୋ ଟ୍ରାଉଜର ଟା ଚିପିକି ରହିଥିବାରୁ ବହୁତ ଆକର୍ଷଣୀୟ ଲାଗୁଥାନ୍ତି ସେ। ମୋର ବି ବାରମ୍ବାର ଧ୍ୟାନ ଭଙ୍ଗ ହୋଉଥିଲା, ଯଥା ସମୟରେ ଖାଇବା ସରିଲା । ମୁ କହିଲି ତୁମେ ଖଟ ଉପରେ ଶୋଇପଡ ମୁ ବାରଣ୍ଡା ରେ ସୋଇପଡିବି, । ସେ କହିଲେ ନାହିଁ ଆପଣ କାହିଁ ବାରଣ୍ଡା ରେ ସୋଇବେ ବରଂ ମୁ ଏଠି ତଳେ ସୋଇଯାଉଛି ଆପଣ ଖଟ ରେ ସୁଅନ୍ତୁ କିଛି ଅସୁବିଧା ନାହିଁ। ମୁ ମନା କଲି କହିଲି ଆପଣ ଉପରେ ସୁଅନ୍ତୁ ମୁ ତଳେ ସୋଇଯାଉଛି। ସେ ରାଜି ହେଲେ , ମୁ ତଳେ ଗୋଟେ ଚଦର ପକେଇଦେଇ ଶୋଇଗଲି,ବଲବ ଲାଗିଥିଲା, ଆଖିକୁ ନିଦ ଅସୁନଥାଏ, ସେ ବି ଖଟ ଉପରେ ଏକଡ଼ ସେକଡ଼ ହୋଉଥାନ୍ତି। ମୋ ଆଖିକୁ କେତେବେଳେ ନିଦ ଆସିଯାଇଛି,ବର୍ଷା ରାତି ହେଇଥିବାରୁ ଟିକିଏ ଶିତ ଲାଗୁଥିଲା ,ଜାକି ହୋଇ ସୋଇଯାଇଥିଲି। ହଟାତ ଅନୁଭବ ହେଲା କାହା ହାତର ନରମ ଛୁଆଁ , ଶରୀର ରେ ସିଂହରଣ ଖେଳିଗଲା , ନିଶ୍ୱାସ ବଢିଗଲା ମୁଣ୍ଡ ଉଠେଇ ଦେଖେତ ପ୍ରିୟଙ୍କା....... ମୋ ଦେହରେ ଚଦର ଟା ଘୋଡେଇଦଉଛନ୍ତି, ............. ହାତଟାକୁ ଧରି ଦେଲି, ଚମକି ଗଲେ। ଝୁଙ୍କି ପଡିଲେ ମୋ ଉପରେ ରାତିର ନିରବ ଭିତରେ ଜଣେ ଯୁବକ ର ଛାତି ଉପରେ ଜଣେ ଯୁବତୀ। ଦୁହିଁଙ୍କ ଆଖି ପରସ୍ପର କୁ ଖୋଜିଲେ................ ଧୀରେ ଧୀରେ ଦୁହିଁଙ୍କ ନିଶ୍ୱାସ ପ୍ରଖର ହବାକୁ ଲାଗିଲା....................କାମାନାଳରେ ଦୁହେଁ ଦଗ୍ଧଭୁତ । ନିବଡ଼ ବାହୁ ବନ୍ଧନ ଭିତରେ ଚରମ ଆତ୍ମତୃପ୍ତି ର ପିପାସା....... ନିଶବ୍ଦ ରାତିରେ କେବଳ ନିଶ୍ୱାସ ର ଘୋର ଗର୍ଜନ, ଶରୀର କ୍ରମଶଃ ଘର୍ମାକ୍ତ, ଦୁଇ ମନ ଦୁଇ ଶରୀର ର ମିଳନ ପାଇଁ ଉଛୁକତା ବଢ଼ିବାରେ ଲାଗିଲା......ମୁ କୋଠରୀର ଲାଇଟ କୁ ବନ୍ଦ କରିଦେଲି.........................

       ବର୍ଷା ରାତିର ନୀଶବ୍ଦତା କୁ ଭଙ୍ଗ କରୁଥିଲା ଆମ ଦୁହିଁଙ୍କ ପ୍ରଖର ନିଶ୍ୱାସ। ରାତିର ଅନ୍ଧକାର ଭିତରେ କମାଗ୍ନି ଜଳି ଆଲୋକିତ କରୁଥିଲା ଉନ୍ମାଦନା ଭରା ମନକୁ। ସେହି ଆଲୋକ ଭିତରେ ଦୁହେଁ ଦୁହିଁଙ୍କୁ ଖୋଜୁଥିଲୁ। ମନରେ ଚରମ ଆତ୍ମତୃପ୍ତି ର ଇଛା। ପ୍ରଣୟ ର ରଙ୍ଗରେ ଦୁହେଁ ରଙ୍ଗାୟିତ । ମଦନ ର କାମ ବାଣ ରେ ଦୁହେଁ କ୍ଷତାକ୍ତ, ଜର୍ଜରିତ କାମନା ର ମାଦକତା ରେ। ଉନ୍ମାଦନା ର ଚରମ ସୀମାରେ ଦୁହେଁ ପହଁଚି ସାରିଥିଲୁ,। ପ୍ରେମ ପ୍ରଣୟ ରେ ଯେ ଏତେ ମାଦକତା ଥାଏ ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ଅନୁଭବ ହେଇଥିଲା ମତେ। ରାତିର ପ୍ରାୟ ଶେଷ ପ୍ରହର ବେଳକୁ ଅଶାନ୍ତ ସମୁଦ୍ର ଶାନ୍ତ ହେବାରେ ଲାଗିଲା। ଭଟ୍ଟା ପଡିଲା କାମନା ଜୁଆରରେ........ଅନୁଭବ ହେଲା ମନରେ ଅସୀମ ଆନନ୍ଦ। ଘର୍ମକ୍ତ ଶରୀର କ୍ରମେ ଶୁଷ୍କ ହେବାରେ ଲାଗିଲା, କ୍ଲାନ୍ତ ଶରୀରରେ ଘର୍ମ ବିନ୍ଦୁର ଶିତଳତା ମନକୁ ରୋମାନଚିତ କଲା। ମୋ ଛାତି ଉପରେ ମୁଣ୍ଡକୁ ରଖି ସେମିତି ସୋଇଥାନ୍ତି ପ୍ରିୟଙ୍କା। ରାତି ପାହି ପାହି ଆସୁଥାଏ ଦୁହେଁ ପରସ୍ପର ଠୁ ଅଲଗା ହେଲୁ। ଶରୀର ଅବଶ ଲାଗୁଥାଏ, କ୍ଲାନ୍ତି ବାରି ହୋଉଥିଲା ଶରୀରର ପରିଭାଷାରୁ, ଶୁଷ୍କ ଲାଗୁଥିଲା ମୁଖମଣ୍ଡଳ। ନିଜ ନିଜର ଅସଜଡା ଶରୀର କୁ ସଜାଡି ସାରି ନିଜ ନିଜ ନିତ୍ୟ କର୍ମ ସାରିଲୁ। ରାତିର ଘଟଣା ପାଇଁ ମୁଁ ନିଜକୁ ଦୋଷୀ ଭାବିଲି। ସେ ବି ସେମିତି ନିରବ ଥାନ୍ତି । ସାହସ ହେଉନଥାଏ କିଛି କହିବାକୁ। ଗାଧେଇ ସାରି ନିଜ ଅସଜଡା କେଶକୁ ସଜାଡୁ ଥାନ୍ତି ପ୍ରିୟଙ୍କା, ଭାବିଲି ରାତି ର ଘଟଣା ପାଇଁ କ୍ଷମା ମାଗିବି। ପାଖକୁ ଯାଇ ହାତକୁ ଧରିଦେଲି , ମୁଂହ ଉଠେଇ ଚାହିଁଲେ , ଆଖି ରେ ଆଖି ମିଶିଲା ପରେ ଲାଜେଇଗଲେ ସେ ମୁଂହକୁ ତଳକୁ କରିଦେଇ ଘୁଂଚିଗଲେ ପଛକୁ। ମୋ ଛାତିରେ ସୃଷ୍ଟି ହେଇଥିବା ଆଶଙ୍କା ର ଝଡ ଟିକିଏ ଥମିଲା ଭଳି ଲାଗିଲା। "କାଲି ରାତିରେ ହେଇଥିବା ଭୁଲ ପାଇଁ ମୁଁ କ୍ଷମା ମଗୁଛି , " କହିଲି ମୁଁ......।

ମୁଂହ ତଳକୁ ସେମିତି ରହିଥାନ୍ତି ସେ, ଧୀର ସ୍ୱର ରେ କହିଲେ " ଭୁଲ ଅପଙ୍କର ନୁହଁ କି ମୋର ବି ନୁହଁ , ଭୁଲ ହେଉଛି ଆମ ବୟସ ଆଉ ଆମ ପାରିପାର୍ଶ୍ବିକ ପରିସ୍ଥିତି ର , ଏଥିପାଇଁ ଆମେ ନିଜକୁ ଦୋଷ ଦେବା ଅନୁଚିତ"। ପ୍ରିୟଙ୍କା ଙ୍କ ଏ କେଇପଦ କଥା ଶୁଣିବା ପରେ ମୋ ମନରୁ ସବୁ ଭୟ ଦୁରେଇ ଗଲା। କାହିଁକି କେଜାଣି ଦେଖିଲା ପରଠୁ ମତେ ନିଜର ନିଜର ଲାଗୁଥିଲେ ସେ, ମନରେ ତାଙ୍କ ପ୍ରତି ପ୍ରେମ ଜାଗ୍ରତ ହେଇଥିଲା ତାଙ୍କୁ ଦେଖିବା ପରଠୁ। କଣ କରିବି ଭାବିପରୁନଥାଏ। ସେ ସେମିତି ନିରବ ଭାବରେ ରହିଥାନ୍ତି କିନ୍ତୁ ଓଠରେ ତାଙ୍କ ହସ ଥିଲା। ଲାଜେଇକି ରହିଥାନ୍ତି ସେ। ସାହସ କରି ହାତକୁ ପୁଣି ଧରିଲି। ପ୍ରେମ ନେବେଦନ କରିବାକୁ ସାହସ ଜୁଟେଇଲି। " ତୁମକୁ ଦେଖିବା ପରଠୁ ମୁ ମୋ ମନ ଆଉ ହୃଦୟ ତୁମକୁ ଦେଇ ସରିଛି, ସାରା ଜୀବନ ତୁମର ହେଇ ରହିବାକୁ ଚଂହୁଛି,। " ମୋ ମୁଂହରୁ ଏମିତି ଶୁଣିବ ପରେ ମୁଂହ ଉଠେଇ ଚାହିଁଲେ ମତେ , ଲାଜ ମିଶା ହାସଟିଏ ଦେଇ ପୁଣି ମୁଂହ ତଳକୁ କରିଦେଲେ। ମୁ ସେମିତି ତାଙ୍କ ହାତକୁ ଧରିଥାଏ । ମୁଂହରେ ହସ ଦେଖି ବୁଝିପାରିଲି ମନର କଥା,ଟାଣି ଆଣିଲି ଛାତି ଉପରକୁ ,ନିଜ ବହୁବନ୍ଧନରେ ବାନ୍ଧି ରଖିଲି । ବହୁତ ଭଲ ପାଏ ଆପଣଙ୍କୁ" ଧୀରେ କହିଦେଲେ ମତେ। ତାଙ୍କରି ଏଇ ଗୋଟେ ପଦ କଥା ମନ କୁ ଆନନ୍ଦିତ କରିଦେଲା। ଦୁହେଁ ଭାବନା ରାଜ୍ୟ ରେ ହଜିଗଲୁ। ...............

   ସମୟ ଆସି ଆଠଟା ବାଜିଲାଣି, ସମୟକୁ ନିଘା ନଥାଏ ଏକଲୟରେ ଚାହିଁ ରହିଥିଲୁ ଦୁହେଁ ଦୁହିଁଙ୍କୁ। ଘଣ୍ଟାର ଘଣ୍ଟି ଶବ୍ଦ ରେ ପ୍ରକୃତିସ୍ଥ ହେଲୁ , ଅଫିସ ବେଳ ହେଇଗଲାଣି , ତରତର ହେଇ ଜଳଖିଆ ପ୍ରସ୍ତୁତି ରେ ଲାଗିପଡିଲୁ। ମୋର କିନ୍ତୁ କୋଉଥିରେ ମନ ନଥାଏ , ପ୍ରେମର ଚୁମ୍ବକୀୟ ଆକର୍ଷଣ ମତେ ଆକର୍ଷିତ କରିଥାଏ ପ୍ରିୟଙ୍କା ଙ୍କ ଆଡକୁ। ଯଥା ସମୟରେ ଦୁହେଁ ଅଫିସ ବାହାରିଲୁ। ଗୋଟେ ରାତିରେ ଆମ ସମ୍ପର୍କରେ ଏତେ ନିବିଡ଼ତା ଆଇଯାଇଥିଲା ଯେ କେହି କାହାକୁ ମୁହୁର୍ତେ ଛାଡିବା ପାଇଁ ଇଚ୍ଛା କରୁନଥିଲୁ। "ଅଫିସ ରୁ ଫେରିଲା ପରେ ପୁଣି ସେଠି ମିଶିବା ଯୋଉଠି କଲି ଦେଖା ହେଇଥିଲା"ମୁ କହିଲି । ପ୍ରିୟଙ୍କା କିନ୍ତୁ କହିଲେ ନାହଁ , ମୁ କାଲିଠୁ ଘରକୁ ଯାଇନି , ବାପା ବହୁତ ବ୍ୟସ୍ତ ହୋଉଥିବେ, ମୁ ଆଜି ଶୀଘ୍ର ଘରକୁ ଚାଲିଯିବି। .....ମୁ ବି ଭାବିଲି କଥାଟା ଠିକ। ତେଣୁ ବାଧ୍ୟ କଲିନି ତାଙ୍କୁ ଦୁହେଁ ଯଥା ସମୟରେ ଅଫିସ ରେ ପହଂଚିଲୁ। ମୋର କିନ୍ତୁ କାମରେ ମନ ନଥାଏ। ପ୍ରିୟଙ୍କା କଥା ଭାବିଲା ବେଳକୁ ମନରେ ରୋମାଞ୍ଚ ଖେଳିଯାଏ। ........ଏମିତି  କେତେ ଦିନ କେତେ ରାତି ମୋର ଭାବନାରେ ବିତି ଯାଇଥାଏ ମୁ ନିଜେ ଜଣେନା। ଦିନକୁ ଦିନ ଆମ ସମ୍ପର୍କର ଗଭୀରତା ବଢ଼ିବାରେ ଲାଗିଲା, ପରସ୍ପର କୁ ମୁହୁର୍ତେ ନଦେଖିଲେ ରହି ପାରୁନଥିଲୁ। ଯେମିତି ଜଣକ ବିନା ଆଉ ଜଣେ ଅଧୁରା, ଅଫିସ ରୁ ବିରତି ନେଇ ଦୁହେଁ ସମୟ ବିତାଉ। କାହାରିକୁ ନିଘା ନଥାଏ। ସମୟ ଅତିକ୍ରାନ୍ତ ହୋଇ ଚାଲିଥାଏ ଗାଁ କୁ ଗଲେ ସେଠି ଆଉ ରହିବାକୁ ମନ ଲାଗେନି, ଛୁଟି ଦିନ ପଡିଲେ ଭାରି କଷ୍ଟ ହୁଏ ରହିବା। ........... ପାଖା ପାଖି ସାତ ମାସ ର ସମ୍ପର୍କ ପରେ ଦିନେ ପ୍ରିୟଙ୍କା କହିଲେ , ଆମ ସମ୍ପର୍କ କୁ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ପରିବାରରେ ଜଣାଇଦବା ପାଈଁ। ମୁ ବି ସମ୍ମତି ଦେଲି । ଆଗକୁ ଛୁଟି ଥିଲା ଗାଁ କୁ ଯିବି ବୋଲି ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେଲି। ସେ ବି ରାଜି ହେଲେ। ...........ଶନିବାର ସନ୍ଧ୍ୟା ରେ ଗାଁ କୁ ଯାଇଥାଏ , ବାପା ଙ୍କୁ କେମିତି କହିବି ଏ କଥା ଭାବୁଥାଏ। ଭାବିଲି ରାତିରେ କହିବିନି ସକାଳ ହେଲେ କହିଦେବି। ବାପା ରାଜି ହେବେ ନା ନାହିଁ ଏମିତି ଭାବି ଭାବି ରାତି ନିଦ ହୋଉନଥାଏ। ସକାଳ ହେଲା ବାପା ବସି ଚା ପିଉଥାନ୍ତି , ପାଖରେ ଯାଇ ଠିଆ ହେଲି ଧୀର ସ୍ଥିର ଭାବରେ। ମତେ ଦେଖି ବାପା ବସିବାକୁ କହିଲେ , ମୋ ଦେହରୁ ଝାଳ ବୋହିପଡୁଥାଏ କେମିତି କହିବି ଭାବୁଥାଏ। "କିଛି କହିବୁକି, ବାପା କହିଲେ" ତାଙ୍କ କଥା ଭାରି ଓଜନିଆ। ଭୟ ଲାଗେ ତଥାପି ସାହସ ଜୁଟେଇ କହିଦେଲି " ବାପା ମୁ ପ୍ରିୟଙ୍କା କୁ ଭଲ ପାଏ , ତାଙ୍କୁ ବହାହାବାକୁ ଚାହେଁ" ? ମୋ ମୁଂହରୁ ଏ କଥା ଶୁଣିଲା ପରେ ରାଗିଗଲେ ବାପା, କାହାଠୁ ଅନୁମତି ନେଇ ଅ ନିଷ୍ପତି ନେଲୁ। ମୁ ନିରବ ରହିଲି । ତୋର ବହୁତ ସାହସ ହେଇଗଲାଣି ଦେଖୁଛି।ବହୁତ ଗାଳି କଲେ ମତେ ସେଦିନ , ସଫା ସଫା ଶୁଣେଇଦେଲେ ଯଦି ତୁ ମୋ ଇଛା ବରୋଧ ରେ ଯାଇ ସେ ଝିଅ କୁ ବାହା ହେଲୁ ତାହାଲେ ମୋ ସହିତ ତୋର କୌଣସି ସମ୍ପର୍କ ରହିବ ନାହିଁ। ବାପାଙ୍କ ମୁଂହରୁ ଏମିତି ଶୁଣିଲା ପରେ ମୁ ହାତବକ ହେଇଗଲି।" ଭଲପାଇ ବିବାହ କରିବା ଆମ ଅଭିଜାତ୍ୟ , ବଂଶ ପରମ୍ପରା ରେ ନାହିଁ, ମୋ ବୋହୁ ହବା ପାଇଁ ସେମିତି ଜଣେ ଗାରିମା ସମ୍ପନ୍ନ ପରିବାର ହବା ଦରକାର"। ବାପା କହିଲେ। ବାପା ଙ୍କ ଠୁ ଏମିତି ଶୁଣିବା ପରେ ରାଗରେ ସହରକୁ ଆସିଲି। ରାତି ହୋଇଯାଇଥାଏ, ଆଖିରୁ ଲୁହ ବହି ଚାଲିଥାଏ। କଣ ଜବାବ ଦେବୀ ପ୍ରିୟଙ୍କା କୁ ସେ କଥା ଭାବି ଭାବି ରାତି ପାହିଗଲା। ଅଫିସ ଯିବା ପୂର୍ବରୁ ମିସିଲି ତାଙ୍କ ସହ , ବହୁତ ଖୁସି ଥାନ୍ତି ସେ , ନିଜ ବାପାଙ୍କ ଠୁ ସ୍ୱୀକୃତି    ପଇସାରିଛନ୍ତି ବୋଧେ। ମତେ ଦେଖି ଖୁସି ହେଇଗଲେ, ଜାବୁଡି ଧରି କହିଲେ ........ଅବିନାଶ ବାପା ଆମ ସଂପର୍କ କୁ ନେଇ ଖୁସି ଅଛନ୍ତି। ତମ ସହ ବାହା ଦେବାପାଇଁ ସେ ପ୍ରସ୍ତୁତ। ସେତବେଳକୁ ମୋ ଆଖିରୁ ଲୁହ ବୋହୁଥାଏ , ମୋ ଲୁହରୁ ଗୋଟିଏ ବିନ୍ଦୁ ପ୍ରିୟଙ୍କା ଙ୍କ ଉପରେ ପଡ଼ିଲା , ମୁଂହ ଉଠେଇ ଚାହିଁଲେ ମତେ,"କଣ ହେଇଛି ଅବିନାଶ ତୁମେ କାନ୍ଦୁଛ କାହିଁକି"। ବାପା ଙ୍କ ଇଛା କୁ ପରିପ୍ରକାଶ କଲି ତାଙ୍କ ପାଖରେ, ମୋ କଥା ଶୁଣି , ଝାଉଁଳି ପଡିଲେ ସେ। ଧାର ଧାର ଲୁହ ବୋହିଗଲା ଦୁହିଁ ଙ୍କ ଆଖିରୁ। କେହି କାହାକୁ ଛାଡିବା ସମ୍ଭବ ନଥିଲା ଆମ ଭିତରେ। ବାପାଙ୍କ କଥାକୁ ଖାତର ନକରି ବିବାହର ପ୍ରତିଶୃତି ଦେଲି । ......... ସେ ବି ମତେ ବାରଣ କଲେନି, ଗୋଟେ ସପ୍ତାହ ପରେ ପ୍ରିୟଙ୍କା ସହିତ ମୋ ବାହାଘର ହେଇଗଲା ସହରରେ, ତାଙ୍କ ବାପାଙ୍କ ଉପସ୍ଥିତି ରେ। ଭାବିଲି ବାପା ତାଙ୍କ ରାଗ ଭୁଲି ଆମକୁ ଆପଣେଇ ନେବେ , ସେଥିପାଇଁ ଗାଁ କୁ ଗଲୁ ସମସ୍ତେ। ବାପା ଆମକୁ ଦେଖି ରାଗରେ ଜଳିଲେ। ମତେ ବହୁତ ଭର୍ଚ୍ଛନା କଲେ,ବୋଉ ବି ନିରୁପାୟ ଭୋ ଭୋ ହେଇ କାନ୍ଦିବା ଛଡ଼ା ଆଉ କିଛି କହିପାରିଲା ନାହିଁ। ଘର ବାହାରୁ ଆମକୁ ଦୁଆର ବନ୍ଦ କରିଦେଲେ ଆମକୁ। ଛାତିରେ ଛାତିଏ କୋହ ସୃଷ୍ଟି ହେଲା। ମୁ ଆଉ ପ୍ରିୟଙ୍କା ସହରରେ ରହିବାକୁ ଠିକ କଲୁ। ବେଶ ଖୁସି ରେ ଅଛୁ ଆମେ। ଖାଲି ଏତିକି ଦୁଃଖ ରହିଗଲା ବାପା ଆଜି ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଆମକୁ ଗ୍ରହଣ କରିପାରିଲେନାହିଁ।


  ଭଲ ପାଇବା ଟା କଣ ଭୁଲ, ନା ଘର ଲୋକଙ୍କ ଇଛା ବିରୋଧ ରେ ଯାଇ ବାହା ହବା ଟା ଭୁଲ। ମୋର ଭୁଲ କଣ କୁହନ୍ତୁ। 


**********

କୃପାସିନ୍ଧୁପୁର
ଶେରଗଡ
ଗଞ୍ଜାମ

ତୁମେ ଫେରିଛ କି

ତୁମେ ଫେରିଛ କି ସଜ ସକାଳର 

ସୁମନ ସୁବାସ ସାଥେ 

ଝରା ଶେଫାଳୀର ଅସରା ମହକେ 

ଜୀବନର ଚଲାପଥେ 

ବେସୁରା ସମ୍ପର୍କ ଗୀତେ 

ତୁମେ ଫେରିଛ କି ସ୍ବର ଟିଏ ହୋଇ 

ତାଳ ଲୟର ସହିତେ 


ତୁମେ ଫେରିଛ କି ଦ୍ଵିତୀୟା ଜହ୍ନର 

ଦେବ ଦୁର୍ଲଭ ଦ୍ୟୁତିରେ 

ପୂର୍ଣ୍ଣିମା ବୀହିନ ଏଇ ଜୀବନରେ 

ଶୁକ୍ଳ ପକ୍ଷର ତିଥିରେ 

ନିର୍ଜନ ଅର୍ଦ୍ଧରାତିରେ 

ତୁମେ ଫେରିଛ କି କଇଁର ପ୍ରାଣରେ 

ଚିର ଇପ୍ସିତ ପ୍ରୀତିରେ


ତୁମେ ଫେରିଛ କି ଶେଷ ବସନ୍ତର 

ପୁନଃ ଆବାହନୀ ହୋଇ 

ଭୂମି ଠାରୁ ଭୂମା ଅପୂର୍ବ ଉପମା 

ସର୍ଜନାର ସାହାନାଇ 

ପୂର୍ଣ୍ଣଛେଦ ଟିଏ ନେଇ 

ତୁମେ ଫେରିଛ କି ପ୍ରତାରିତ ପ୍ରାଣେ 

ଅପେକ୍ଷାର ଅନ୍ତ ହୋଇ 


ରଞ୍ଜନ କୁମାର ମହାନ୍ତି 
ବାଲେଶ୍ୱର 

ଆଦର୍ଶ ପରିବାର (ପ୍ରବନ୍ଧ)

ନଳିନୀ ପ୍ରଭା ମିଶ୍ର

  If well-ordered,well instructed and and we'll

Government families are

the springs from which

go forth the statement of

National great ness and

Prosperity of civil ordered

public happiness.

       ଯଦି ଉତ୍ତଯ ନିର୍ଦ୍ଦେଶ ପ୍ରାପ୍ତ,

ଉତ୍ତମ ଶିକ୍ଷା ପ୍ରାପ୍ତ, ଏବଂ ଉତ୍ତମ ଅନୁଶାସିତ ସ୍ତରର ପରିବାରଟିଏ

ଗଠିତ ହୋଇଥାଏ, ତେବେ ସେହି

ପରିବାର ହିଁ ହୋଇଥାଏ ସମାଜର

ଉତ୍ସ ଏବଂ ସେହି ଉତ୍ସତାରୁ ହିଁ ଜାତୀୟ ମହାନତା ଓ ଆନ୍ତନିଃର୍ଦ୍ଦେଶୀୟ ଜନସାଧାରଣ ଙ୍କର

ସୁଖ ଓ ସମୃଦ୍ଧି ଶାଳୀ ଦିଗକୁ ଆଗେଇ ନେଇଥାଏ।

   ପରିବାର କହିଲେ କେବଳ ଯେ,

ରହିବା ,ଖାଇବା ଭିତରେ ସୀମିତ

ତାହା ନୁହେଁ ବରଂ ଏକ ଆଦର୍ଶ

ଧାରା ଭିତରେ ପର୍ଯ୍ୟବେଶିତ ପରିବାର ନିଜର ଉଜ୍ଜ୍ବଳ ଦୃଷ୍ଟାନ୍ତ କୁ

ନେଇ ସମାଜର ଉତ୍ସ ହୋଇଥାଏ।

ଆଦର୍ଶ କହିଲେ ନୈତିକତା, ସଚ୍ଚୋଟତା,ସମୟାନୁବର୍ତ୍ତୀ, ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ମନୋଭାବ, ଦେଶପ୍ରେମ

ତ୍ୟାଗ,ସହନ ଶୀଳତା ଆଦି ବହୁବିଧ

ଗୁଣାବଳୀ କୁ ବୁଝାଏ। ଆଦର୍ଶ ଦମ୍ପତି ଙ୍କୁ ନେଇ ଆଦର୍ଶ ପରିବାର ଗଢିଉଠେ। ମନୁଷ୍ୟ ହେଉଛି ସାମାଜିକ ପ୍ରାଣୀ। ସମାଜ ସହିତ ନିଜକୁ ଜଡ଼ିତ କରି ନିଜ ଚାଲିଚଳନକୁ ସଜାଡି ନେଇ ଏକ ମହାନ୍ ବ୍ୟକ୍ତିତ୍ବର ପରିଚୟ ପ୍ରଦାନ

କରୁଥିବା ବ୍ୟକ୍ତି ଜାତୀୟତାର ମହାନ୍ ଚିନ୍ତାଧାରାରେ ଉଦବୁଦ୍ଧ ହୋଇ ଜନସାଧାରଣଙ୍କ ର ସୁଖ

ସମୃଦ୍ଧି ନିମିତ୍ତ ସବୁ କିଛି କରିପାରେ।

ଜଣେ ବ୍ୟକ୍ତି ର ଆଦର୍ଶ ଗଠିତ ହୋଇଥାଏ ତା' ପରିବାର ଠାରୁ।

 ପିତା ମାତା,ଭାଇଭଉଣୀ ସମସ୍ତଙ୍କ

ଗହଣରେ ରହି ସେମାନଙ୍କ ଠାରୁ

ଭଲ କଥା ଶିକ୍ଷା କରିଥାଏ, ଯାହାକି

ପରବର୍ତ୍ତୀ ସମୟରେ ତାକୁ ମହାନ୍

କରିଥାଏ ‌।

  ମହାତ୍ମା ଗାନ୍ଧୀ, ଶାସ୍ତ୍ରୀ,ନେହେରୁ

ସୁବାସ ବୋଷ ଙ୍କ ଭଳି ମହାନ୍ ନେତା ମାନେ ନିଜ ନିଜ ପରିବାର

ଭିତରୁ ହିଁ ଆଦର୍ଶ କୁ ନିଜ ମୂଳ

ମନ୍ତ୍ର ରୂପେ ଗ୍ରହଣ କରିନେଇଥିଲେ।

   ଜଣେ ସଙ୍ଗୀତଜ୍ଞ ଯେପରି ନିଜ 

ସଙ୍ଗୀତ ପରିବାର ଭିତରୁ କଳାର

ଆଦର୍ଶ କୁ ଗ୍ରହଣ କରି ନେଇଥାଏ,

ଜଣେ ଚିତ୍ର କର ମଧ୍ୟ ଚିତ୍ରକଳା ପରିବାର ଭିତରୁ ଚିତ୍ର ଦୁନିଆକୁ ଟାଣି

ହୋଇଯାଇଥାଏ। ପିତା ର ଦେଶପ୍ରେମ ,ମାଆର ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକତା ଏ

ସମସ୍ତ ପ୍ରତିଫଳିତ ହୋଇଥାଏ ସନ୍ତାନ ଉପରେ। ପରିବାରର ଉତ୍ତମ

ଅନୁଶାସନ ପିଲାକୁ କୁପଥ ପ୍ରତି ନେଇ ନଥାଏ। ପରିବାରର ଆଦର୍ଶ

ସମାଜର କଲ୍ୟାଣ ଦିଗରେ

ନିଜକୁ ଉତ୍ସର୍ଗ କରିବା ମନୋବୃତ୍ତି

ସୃଷ୍ଟି କରିଥାଏ। ଉତ୍ତମ ଶିକ୍ଷା ଦାନ

ସାଙ୍ଗକୁ ସମୟାନୁବତ୍ତିତା, ସତ୍ୟବାଦୀତା,ଉତ୍ତମ ବ୍ୟବହାର

ଆଦର୍ଶ ହେବା ପାଇଁ ଖୋରାକ

ଯୋଗାଇଥାଏ‌।ଯାହା  କି ଦେଶ ଓ

ଜାତିର ଅଗ୍ରଗତି ଦିଗରେ ଜଣେ

ମଣିଷ କୁ ମଣିଷ ରୂପରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ କରିଥାଏ।

ମହାମାନବ ମହାତ୍ମା ଗାନ୍ଧୀ ହେଉଛନ୍ତି ତା'ର ଜ୍ଵଳନ୍ତ ଉଦାହରଣ।

ଅତଏବ ପ୍ରତ୍ୟେକ ପରିବାର ନିଜ

ପରିସର ଭିତରେ ଆଦର୍ଶ ଧାରା ସୃଷ୍ଟି

କରିବା ଉଚିତ।

ମୁକୁନ୍ଦ ପୁର, ଆସ୍କା, ଗଞ୍ଜାମ

କାର୍ତ୍ତିକର ଅନ୍ତଃସ୍ୱର

 ...ସ୍ମୃତି ଚୌହଦୀରେ କାର୍ତ୍ତିକ ମାସ...

        ମୋ କୁନି ଆଖିରୁ ନିଦ ଛାଡ଼ୁ ଛାଡ଼ୁ ଫର୍ଚ୍ଚା ଦିଶିଯାଏ ଚାରିଆଡ଼..। ଚଉରାମୂଳ ବି ସଜେଇ ହେଇସାରିଥାଏ ରଙ୍ଗବେରଙ୍ଗ ମୁରୁଜରେ । ମୋ' ପାଇଁ ଆଉ ଜାଗା ନଥାଏ । ମୁଁ ମନଦୁଃଖ କରେ । ବଡ଼ମାନେ ବୁଝେଇ ସୁଝେଇ ମୁରୁଜ ପକେଇବାକୁ କହନ୍ତି । ମୋ କୁନି ଟିପରେ କ'ଣ କେତିକି ମୁରୁଜ ଯାଏ କେଜାଣି ମେଞ୍ଚା ମେଞ୍ଚା ପଡ଼ି ବିଲେଇ ରାମ୍ପୁଡ଼ିଲା ପରି ଦିଶେ । କିନ୍ତୁ ଅନ୍ୟମାନେ କହନ୍ତି ବଢ଼ିଆ ହେଇଛି ! ବୋଧେ ସେଇ 'ବାହାଃବା' ମତେ ଆଜି ଗୋଟେ ଚିତ୍ରଶିଳ୍ପୀ ବନେଇଦେଇଛି..!! ଚାହୁଁ ଚାହୁଁ ଆସିଯାଏ ଦୀପାବଳି..! ଶ୍ରାଦ୍ଧ ପଡ଼ିବ ବୋଲି ସମସ୍ତେ ବ୍ୟସ୍ତ ଦିନସାରା-ମୁଁ ବୁଝିପାରେନି; କିନ୍ତୁ ଖାଲି ବୋଲହାକ କରିପକାଏ । ଏତେ ଲୋକରେ କି ଖୁସି..!! ଖାଲି 'ବଡ଼ବଡ଼ୁଆ ହୋ' କହିଲା ବେଳକୁ କାଉଁରିଆ ପଛପଟୁ ଏତେ ଧୂଆଁ ବାହାରେ ଯେ ମୁଁ ବିକଳରେ ତାକୁ ଚାହିଁଥାଏ- ଗୁରୁଜନମାନେ ଶିଖେଇଦିଅନ୍ତି କେମିତି ଧରନ୍ତି ସେ କାଠି, କେମିତି ପ୍ରାଣଭରେ ଡାକନ୍ତି ପୂର୍ବପୁରୁଷମାନଙ୍କୁ..ମତେ କିଛି ଶୁଣାଯାଏନି..କ'ଣ ସେମାନେ 'ବଡ଼ବଡ଼ୁଆ ହୋ' ପଦ ପରେ ଗାଆନ୍ତି-- କିନ୍ତୁ ମୁଁ ସେଇ ସ୍ଵରରେ ଲହରେଇ କେତେ କ'ଣ ଗାଇଯାଏ ! ସେଇ ବର୍ଷକୁ ଥରେ ଦେଖିବାକୁ ପାଏ କେତେ କେତେ ଗୁରୁଜନମାନଙ୍କୁ..ସେତେବେଳେ 'ଈଶାଣ' କ'ଣ, 'ବଡ଼ବଡ଼ୁଆ' କ'ଣ କିଛି ମୁଣ୍ଡରେ ପଶୁନଥିଲା..ଆକାଶକୁ ସମସ୍ତେ କାଉଁରିଆ ଦେଖାଇ ଚାହିଁଲାବେଳେ ମୁଁ ଖୋଜୁଥିଲି 'ଜହ୍ନମାମୁଁ'କୁ..ଧେତ୍ ! କେଡ଼େ ବୋକା ଥିଲି ମୁଁ ?! ଅମାବାସ୍ୟାରେ ମାମୁଁ କୁଆଡ଼ୁ ଆସିବେ ?? "ଆ କା ମା ବୈ.." ଏତିକି ପାଟିରେ ପଶୁଥିଲା । ସେତିକି ଯଥେଷ୍ଟ ଥିଲା ସେତେବେଳେ.. ବୋଧେ ସେଇ 'ଯଥେଷ୍ଟ' ମତେ ଆଜି ମୋ ସଂସ୍କୃତିକୁ ଜାଣିବାକୁ-ବୁଝିବାକୁ-ପାଳନ କରିବାକୁ 'ସଚେଷ୍ଟ' କରିଦେଇଛି ।

          ଏବେ ବୁଝିପାରୁଛି କେତେ ପୁଣ୍ୟ କରିଥିଲା 'କୃତ୍ତିକା', ଗୋଟେ ମାସକୁ ଜାବୁଡ଼ି ଧରିଛି ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକତାର  ରଜ୍ଜୁରେ..ଦୁର୍ଲ୍ଲଭ ମହାପ୍ରସାଦର ବାସ୍ନାରେ..ପ୍ରେୟସୀ ରାଧାର ପାଦଦର୍ଶନରେ..ନିତ୍ୟ ରାଧାଦାମୋଦର ବେଶରେ..ମହ ମହ ହବିଷ ଭାତରେ..ମିଞ୍ଜି ମିଞ୍ଜି ଆକାଶ ଦୀପରେ..ମୋ ଓଡ଼ିଆକୁଳର ଗର୍ବଗୌରବ-ଐତିହ୍ୟ ସିଞ୍ଚିତ ବୋଇତ ବନ୍ଦାଣରେ...।।


ପ୍ରିୟରଞ୍ଜନ ସାହୁ
ରସୁଲଗଡ଼,ଭୁବନେଶ୍ୱର

ଭୀଷ୍ମ ଶରଶଯ୍ୟା

✍ସୁଧାଂଶୁ କୁମାର ତ୍ରିପାଠୀ


      ସ୍ବେଚ୍ଛାମୃତ୍ୟୁ ଭଳି     ବରଦାନ ସହ

ବଞ୍ଚିବାକୁ ସିନା ଦେଲ

ଜୀବନ ଦୀପାଳି     ସଜାଇଛ ଭରି

ଅନୁକମ୍ପା ରୂପୀ ତେଲ ।

ଥିଲା କି କଠୋର    ଅଟଳ ସଂକଳ୍ପ 

ଅଧର୍ମ ପକ୍ଷରେ ରହି

କୁଳବଧୂ କୃଷ୍ଣା      ନିର୍ଯାତନା ମଧ୍ୟ

ନୀରବେ ଯିବାକୁ ସହି ?

ଭୂମିକା ଦେଇଛ     ପୁରୁଷେ ପୂର୍ବରୁ

ନାଟକୀୟ ପରପଞ୍ଚେ

ଚରିତ୍ର ଗୁଡିକୁ       ବୁଝାଇ ନଥିଲ

ଶେଷ ଯାଏଁ ରଙ୍ଗମଞ୍ଚେ ।

ଯେଉଁ ହସ୍ତିନାର     ରାଜ ସିଂହାସନ

ରକ୍ଷା ପାଇଁ ଥିଲା ପଣ

ତାହାରି ଉତ୍ତର    ଦାୟାଦଙ୍କ ସାଥେ

କରିବାକୁ ହେଲା ରଣ ।

ଗଙ୍ଗାପୁତ୍ର ବୋଲି    ସଭିଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟିରେ

ଥିଲି କେବେ ବିବସ୍ବାନ

ବିଧବା ବଧୂଙ୍କ    ଲୋତକ ଗଙ୍ଗାରେ

କରିବାକୁ ହେଲା ସ୍ନାନ ।

ଭାଗ୍ୟରେ ନଥିଲା    କଳାକନାଟିଏ

ବାନ୍ଧି ଦେବାପାଇଁ ଆଖି

ପ୍ରଶଂସା ଜାଗାରେ   ନିନ୍ଦିତ ହେବାକୁ

କରିଥିଲ ମୂକସାକ୍ଷୀ ।

ଦୁଃସାଧ୍ୟ ବିଷମ     ବ୍ରତ ସାଧିବାରେ

ଦେବବ୍ରତ ମୋର ନାମ

ପଶ୍ଚାତାପେ ସଜ୍ଜା    ଏହି ଶରଶଯ୍ୟା 

ପ୍ରତୀକ୍ଷିତ ପରିଣାମ ।

ଶେଷଦୃଶ୍ୟ ଆଗୁ    ମରିଯିବା ପାଇଁ

ଥିଲା ତୁମ ନିର୍ଦେଶନା

ଅନ୍ତେ ମୂଳରୂପ     ଦର୍ଶନ ନିମନ୍ତେ

କରିବନି ଆଉ ମନା ।

ତୃଷିତ ଶିଖାର      ନିର୍ବାପନ ଲାଗି

ଯୋଗାଇ ତୁଳସୀ ପାଣି

ପାର୍ଥର ମୁଖରୁ    ଶୁଣାଇବ ମୋତେ

ତୁମ ଭାଗବତ ବାଣୀ ।


**********
କୃପାସିନ୍ଧୁପୁର
ଶେରଗଡ
ଗଞ୍ଜାମ

ବାପା

ଅରୁଣ କୁମାର ମହାପାତ୍ର


ଦାଣ୍ଡର ଧୂଳିରେ

ପ୍ରଥମ ପାଦ ବୋଧେ ଥାପିଥିଲିି

ତୁମର ଆଙ୍ଗୁଳି ଧରି ।


ବୁଲିଥିଲି ଗାଆଁ ଦାଣ୍ଡେ

ତୁମ କାନ୍ଧେ ବସି

ଥକି ଯାଇଥିଲେ ବି 

ନିର୍ବିକାର ଥିଲା ମୁହଁ ଟି ତୁମର ।


କେତେ ସୁଖଦ ଥିଲା ସେ ନିଦ

ଥିଲା କେତେ ନିରାପଦ

ଶୋଇଯାଉଥିଲିି ଯେବେ

ତୁମ ପେଟକୁ ଜାବୁଡ଼ି।


ସ୍ନେହ ସହ ତାଗିଦ୍ କରିଛ କେତେ,

ଆକଟର ଶବ୍ଦ ସବୁ 

ଶକ୍ତ ଲାଗୁଥିଲା ସତେ।


କିନ୍ତୁ ପର୍ବତଭଳି ନିଶ୍ଚଳ ରହି

ମାର୍ଜିତ କରି

ଗଢି ଦେଇଥିବା ଜୀବନଟା ବୋଧେ

ବର୍ତ୍ତମାନ ଚକଲଗା ରଥ ଭଳି

ଗଡ଼ିଚାଲେ ପଥୁରିଆ ଚଟାଣ ଉପରେ।


ତୁମ ଉପଦେଶ ଆଉ ଜ୍ଞାନ ଦର୍ଶନ

କରି ଦେଇଛି ଆଜି ଆତ୍ମନିର୍ଭରଶୀଳ

ଆଉ ଶିଖାଇ ଦେଇଛି

 ଆତ୍ମଭିମାନରେ ବଞ୍ଚିବାର ଶୈଳୀ।


ତୁମେ ଶିଖାଇ ଦେଇଛ

ଅନ୍ଧାରୁ ଆଲୋକ ସାଉଣ୍ଟିବାର ରାସ୍ତା।

ଆଉ ମଧ୍ୟ ଉଦାସୀନତାରୁ ବାହାରି ଆସି

ବଞ୍ଚିବାର ଶୈଳୀ।


ତୁମେ ଥିଲ ଅଛ ଆଉ ଥିବ

ମୋର ଦିଗଦର୍ଶକ ଓ ପ୍ରେରଣାର ଉତ୍ସ।


   ଅଶ୍ୱପୁରମ, ତେଲେଙ୍ଗାନା

ଜୟ ଜଗନ୍ନାଥ ସ୍ବାମୀ

                                ✍ହରିହର ଭୂକ୍ତା

                ଜୟ ଜଗନ୍ନାଥ

                ଜଗତ ଠାକୁର

                ଜଗତର କୃପାସିନ୍ଧୁ

                ଜଗତର ଦୁଃଖ ଶୁଣିବା ନିମନ୍ତେ

                ଜଗତର ଦୀନବନ୍ଧୁ  ।


                ଜଗତି ଉପରେ 

                ଜଗନ୍ନାଥ ସ୍ବାମୀ

                ଜଗତ ବ୍ରହ୍ମାଣ୍ଡ ପତି

                ଜଦୁବଂଶ ନାଥ ଦ୍ବାରିକା ନୃପତି

                ଜୟହେ ସୁଦାମା ସାଥୀ   ।


                ଜମୁନା କୂଳରେ

                ଜହ୍ନ ଆଲୋକରେ

                ଜୟ ରାଧା ଚିତ ଚୋର

                ଜନ ମନ ହରି ଗୋପରେ ଶ୍ରୀହରି

                ଜୟ କଲ ପୁରନ୍ଦର   ।


                ଜଗତ ଶ୍ରୀହରି

                ଜଳନିଧି କୂଳେ

                ଜଗନ୍ନାଥ ନାମେ ଖ୍ୟାତ

                ଜୟ ଜଗନ୍ନାଥ ବ୍ରହ୍ମାଣ୍ଡ କମ୍ପଇ

                 ଜନମୟ ରଥ ଯାତ  ।

          ରାକସ,ତାଳଚେର,ଅନୁଗୋଳ

ଭାବନା ପ୍ରେମର

✍ଶୁଭ୍ରାଂଶୁ ଭୂଷଣ ମେହେର 

ମୋ ମନ ଆକାଶେ ଜହ୍ନ ହୋଇ ତୁମେ 

ପ୍ରେମ ଜ୍ୟୋସ୍ନା ଦେଲ ଢାଳି 

ଗଗନ ବୁକୁରେ ଦିବାକର ମୁହିଁ 

ମୋ କିରଣ ଦେଲି ବୋଳି l

ମନ ଉପବନେ ଫୁଟି ଗଲ ତୁମେ 

ସୁଗନ୍ଧ ସୁମନ ହୋଇ 

ତୁମ ମହକରେ ମୁହିଁ ହେଲି ବାଇ 

ଆଗୋ ମୋର ପ୍ରାଣ ସହି l

ରୁପସୀ ପ୍ରିୟା ମୋ ତୁମ ରୂପ ଗୁଣେ 

ମୁଁ ହୋଇଗଲି ବାଇ 

ଆକାଶରେ କୋଟି ତାରକାର ଜ୍ୟୋତି 

ତୁମେ ମୋର ଚାନ୍ଦମୁହିଁ l

ମୃଗ ନୟନୀ ଗୋ ତୋ ବାଙ୍କ ଚାହାଁଣି 

ମୋତେ କି କିମିଆ କଲା 

ତୋର ପ୍ରେମ ଡୋର ମୋତେ ଛନ୍ଦିଦେଲା 

ମନ ଏକ ହୋଇଗଲା l

ଯୁଗ ଯୁଗର ମୋ ସାଥି ସହଚରୀ 

ଭୁଲି ନ ପାରୁଛି ତୋତେ 

ଛାଡି ଏବେ କାହିଁ ଦୂରେ ଚାଲିଗଲୁ 

ଏକା କରିଦେଇ ମୋତେ l


ମୁଁ /ପୋ -ସାଲେପାଲି 
ଭାୟା -ଜରାସିଂହା 
ଜିଲ୍ଲା -ବଲାଙ୍ଗିର 

ତୁମେ ଅନନ୍ତ

 ✍ରାଜେନ୍ଦ୍ର କୁମାର ବିଷୋୟୀ

★★★★★★★★★★

ହେ ପ୍ରଭୁ !

ତୁମେ ତ ଅମୃତ ଆଶା 

ସକଳ ପ୍ରାଣର ସ୍ପନ୍ଦନ ତୁମେ

ତୁମେ ତ ଅକୁହା ଭାଷା ।।

ଅଖିଳର ତୁମେ 

ନିଖିଳର ତୁମେ

ପ୍ରାର୍ଥନାର ସ୍ୱର ତୁମେ

ଆଲୁଅର ତୁମେ 

ଅନ୍ଧାରର ତୁମେ

ମୂର୍ଛନାର ସ୍ୱର ତୁମେ ।।

ଜୀବନ ବେଦିର 

ଝଙ୍କାର ତୁମେ

ତୁମେ ତ ଅସରା ପ୍ରୀତି

ତୁମେ ତ ସକାଳ

ତୁମେ ତ ସନ୍ଧ୍ୟା

ତୁମେ ତ ଅଲିଭା ଜ୍ୟୋତି ।।

ଦୁଃଖୀର ତୁମେ 

ସୁଖିର ତୁମେ

ପାପୀର ତପୀର ତୁମେ 

ଆଦ୍ୟରେ ତୁମେ

ଅନ୍ତରେ ତୁମେ

ଦୂର ଦିଗ୍ ବଳୟେ ତୁମେ ।।

ପ୍ରଶ୍ଵାସ ତୁମେ

ନିଃଶ୍ଵାସ ତୁମେ

ଜୀବନ ମରଣେ ତୁମେ 

ସକଳ ସୃଷ୍ଟିର

ଆଧାର ତୁମେ

ମୋ ଜୀବନସ୍ଵାମୀ ତୁମେ ।।

ତୁମେ ଅଚ୍ୟୁତ 

ତୁମେ ଅନନ୍ତ

ତୁମେ ପ୍ରଭୁ ବଳବନ୍ତ

ତୁମରି ଚରଣେ

ପ୍ରଣତି ଢାଳି

ନିତି କରେ ପ୍ରଣିପାତ ।।

*******

ପଳାସପଲ୍ଲୀ,ଗଞ୍ଜାମ

ଏଇତ ଜୀବନ

       ✍ବାସନ୍ତୀ ଲତା ଜେନା 

ଏଇତ ଜୀବନ ଅଢେଇ ଦିନର 

ଦୁଃଖ ସୁଖ ସବୁ ପରା 

ଲୋଭ ମୋହ ମାୟା ସ୍ନେହ ଦୟା କ୍ଷମା 

ଗୁଞ୍ଜରଣ କରେ ଧରା      l1l


କିଏ ବସି ଥାଏ ରlଜ ସିଂହl ସନେ 

କିଏ ଭିକ ମାଗୁ ଥାଏ 

କିଏ ଭୋଗ କରେ ଛପନ ବ୍ୟଞ୍ଜନ 

କାହା ପେଟ ଜଳୁ ଥାଏ       l2l


କେତେ ଆଶା କରି ବାପା ମା ମୋର 

ପଢ଼ାଇଲେ ପାଠ ମୋତେ 

ଡିଗ୍ରୀ ପରେ ଡିଗ୍ରୀ ହାସଲ କରିଲି 

ଅକାରଣ ହେଲା ସତେ        l3l


ଅଫିସ ଅଫିସ ଘୂରି ବୁଲିଲି ମୁଁ 

ନ ପାଇଲି ତ ଚାକିରୀ 

ଇସ୍ତାହାର ଦେଖି ଦରଖାସ୍ତ କଲି 

ହୋଇ ଗଲି ମୁଁ ବେକାରୀ       l4l


ବାପା ମାଆ ମୁଖେ ହସ ଦେବା ପାଇଁ 

ଆଜି ଚିନ୍ତା କରୁ ଅଛି 

ଯେ କୌଣସି କାମ କରିବି ମୁଁ ପଛେ 

ଡ଼ିଗ୍ରୀର ମୋହ  ଭାଙ୍ଗିଛି           l5l


ଚାଷ କରିବି ମୁଁ ଯନ୍ତ୍ର ପାତି ନେଇ 

ବୁଣି ଉନ୍ନତ ବିହନ 

ଜୀବନରେ କେବେ ହାରି ଯିବି ନାହିଁ 

ଏଇ ମୋର ସ୍ୱାଭିମାନ         l6l


ଏଇତ ଜୀବନ ସଂସାରେ ଆମର 

ଏଠି ନର୍କ ଏଠି ସ୍ୱର୍ଗ 

ନର୍କ ତ୍ୟାଗ କରି  ସ୍ୱର୍ଗର ସ୍ଥାପନା 

ଏ ହେବ ଆମରି ମାର୍ଗ           l 7l


ଦୁଃଖୀ ରଙ୍କି ମୁଖେ ହସ ଫୁଟାଇବି 

ଆହାର ମୁଠାଏ ଦେଇ 

ପର ସେବାରେ ମୁଁ ଦିନ ବିତାଇବି 

ସତ୍ୟ ମୋ ବଚନ ଏହି     l8l


ମାତା ଜନ୍ମ ଭୂମି ସେବା ମୁଁ କରିବି 

       ଜୀଇଁ ଥିବି ଯେତେ ଦିନ 

ନାରାୟଣ ପଦେ ଲୟ ଥିବ ମୋର 

       କର୍ତ୍ତବ୍ୟରେ ବିତୁ ଦିନ    l9l



ଗାନ୍ଧିନଗର, ନବରଙ୍ଗପୁର  l

ଶୀତ

 ✍କଳ୍ପନା ରାୟ

 ଶୀତ, ତୁ ବୋଧେ ଆସୁ

କାର୍ତ୍ତିକ ହବିଷ ଡାଲମା ର ବାସ୍ନାରେ

କୁହୁକିନୀ କାଶତଣ୍ଡୀର ହିଲ୍ଲୋଳରେ

ସୁନା ଧାନକେଣ୍ଡାର ଆହଟରେ

କୃଷକ ଭାଇର ମନଖୋଲା ହସରେ


ଶୀତ, ତୁ ଆସୁ ନା !!!

ଗରିବର ହାଡ଼ଭଙ୍ଗା ଥରାରେ

ଧାନ ଉଷାଁ ହାଣ୍ଡିର ରଢନିଆଁରେ

ନା ବୁଢୀମାଉସୀର ନିଆଁ ଉହ୍ମେଇରେ

କଅଁଳ ଖରାର ଖଟି ମଜ୍ଜାରେ


ଶୀତ, ପୂର୍ବେ ତୁ ଆସୁଥିଲୁ ନା !!!

ମାଆର ଉଲ୍‌ ଵୁଣାକଣ୍ଟାସହ ଖୁସିରେ

ଗେଣ୍ଡୁଫୁଲର ଗହଳି ଭିତରେ

ବାଲିଆ,ଇନକାର ଅବଗାହନରେ

ସାରିଆଭଗିଆର ଅନୁନୟରେ


ଶୀତ, ତୁ ଆସୁ ପା  !!!

ନାଉଫୁଲ, ଶିମ୍ବ ଫୁଲ ସହ ନଟେଇ

ପୃଥିବୀ ସୁନ୍ଦରୀହୁଏ ଫୁଲଫଳରେ ସଜେଇ

ପିଲାମାନେ ପଢୁଥାନ୍ତି ଖରାରେ ସାପ ପକେଇ

ସହରରେ  କୋଠାଛାଇରେ‌‌ ଖରା ଯାଏ ଉଭେଇ


କଳ୍ପନା ରାୟ, ଲଇଡା, ସମ୍ବଲପୁର

🙏ପ୍ରଭାତ ବନ୍ଦନା🙏

           ✍ଏଲିନା ଶତପଥୀ


ପ୍ରଭାତୁ ଉଠିଣ ମାଗେ

      କରହେ ଆଶିଷ

ଦିନ ଆଜ ଶୁଭେ କଟୁ

    ନହୁଏ ନିରାଶ।


ସେ ପଥେମୋ ପାଦ ପଡୁ

      ଯେଉଁ ମାର୍ଗ ତୁମ ଶ୍ରେଷ୍ଠ

ଚକ୍ଷୁ ଆଜ ଦେଖୁମୋର

       ଯାହା ସବୁଠୁ ପବିତ୍ର।


ମନ୍ଦବାଟୁ ପାଦ ମୋର

       ଆସୁ ପ୍ରଭୁ ଫେରି

ପାପ କର୍ମ ଯାହା ନଦେଖୁ

      ଚକ୍ଷୁ ଅନ୍ଧକାର ଯାଉ ଘେରି।


ଅନ୍ୟର ସେବାରେ ଆଜି

      ହାତ ହେଉ ତତ୍ପର

ମିଠା,ମିଠା କଥା ଝରୁ

       ତୁଣ୍ଡରୁ ମୋହର।


କର୍ଣ୍ଣକୁ ଶୁଭୁ ମୋ ପ୍ରଭୁ

     ତୁମ ମଙ୍ଗଳ ସଙ୍ଗୀତ

ହୃଦୟରେ ପରମ ବ୍ରହ୍ମ

           କର ଆଜି ବାସ।


କାହା ମନରେ କଷ୍ଟ

    ନ'ଆସୁ ମୋର ପାଇଁ

ଏମିତି ମୋ ଦିନ କଟୁ

      ଜଗତ ଗୋସାଇଁ।


ଧନ ଐଶ୍ୱର୍ଯ୍ୟ ଠାରୁ

    ରଖିଵ ଦୂରରେ

ଏତିକି ଆଶିଷ ଝରୁ

      ଆଜି ପ୍ରଭାତରେ।


          ମାଲକାନଗିରି

ଗାଁ ଡାକୁଛି ଆସ

 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴


ନଭଶ୍ଚୁମ୍ଭି, ଚାକଚକ୍ୟ ଦେଇଛି ଜୀବିକାର ମନ୍ତ୍ର

ହରଣ କରିନେଇଛି ଜୀବନୀୟ ହୃଦୟ ତନ୍ତ୍ର

ମିଥ୍ୟା-ଦଙ୍ଗା ରାହାଜାନୀର କୁରୁସଭା ଇଏ

ନିରୀହ ଜୀବନ 'କୃଷ୍ଣା' ନିତି ଲାଞ୍ଛିତା ହୁଏ ।

ଭୁରି ଭୋଜନରେ ପୂରେନା ଉଦର

ଖାଲି ଅର୍ଥାଗମରେ ସଦା ତତ୍ପର....

ଭୁଲି ଅଳିକ ଜୀବନର ବ୍ୟବହାର

ନିରସ ଏଠି ପାର୍ବଣ..

ବାସ୍, କେବଳ କୋଳାହଳ-ଦୂଷିତ ବାତାବରଣ....

ଅଗଣିତ ଯମଦ୍ୱାର ଏଠି

ମରୀଚିକାର ଲୋଭନୀୟ ବିଚିତ୍ର ଗାତ୍ର....

ଅତ୍ର....ତତ୍ର....ସର୍ବତ୍ର.....!!!


ଅହର୍ନିଶ ଡାକୁଛି ମା'.. ସନ୍ତାନକୁ ପରଷିବ ବଞ୍ଚିବାର ରାହା...

କେହି ତ' ଜଣେ କହିଦେବ ଆହାଃ..!!

ଡାକୁଛି ଓଷା..

ପୁନେଇଁ.. ପରବେ.. ସ୍ନେହାର୍ଦ୍ର ନିଶା...

ଚାଲ... ସେଇ ଶ୍ରାନ୍ତ ଗୋଧୂଳି ବେଳାରେ...

ଫେରିଯିବା ଆତ୍ମୀୟ ଚୌହଦୀକୁ

ମାଟି ସାଥିରେ ପାଲଟିବା ମାଟିର ମଣିଷ

ଶାପମୁକ୍ତ ହେବ ସବୁ ଯନ୍ତ୍ର-ମଣିଷ

ଶେଷରେ ଛାଡ଼ି ଶାନ୍ତିରେ ନିଃଶ୍ବାସ

ମାଟି କୋଳରେ ପାଇବା ଟିକେ ଆଶ୍ୱାସ....!!!


ପ୍ରିୟରଞ୍ଜନ ସାହୁ

ରସୁଲଗଡ, ଭୁବନେଶ୍ୱର

ଏକାଗ୍ରତା

 ଅଶୋକ କୁମାର ଗୌଡ

★★★★★★★★★

ସଫଳତାର ଚାବିକାଠି

             ଅଟେ ଏକାଗ୍ରତା

ଲୁଚି ରହିଛି ସଫଳତାର ମନ୍ତ୍ର

               ଏକାଗ୍ରତା ମଧ୍ୟେ ।

ଉତ୍ତମ ମାଧ୍ୟମ ଅଟଇ ଧ୍ୟାନ,

               କରିବାକୁ କାର୍ଯ୍ୟ,

               ଉତ୍ପନ୍ନ ହେବାକୁ ଶକ୍ତି

ବୃଦ୍ଧି ହେବା ପାଇଁ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଓ ସାହସ

କରିବାକୁ କଠିନରୁ 

କଠିନତର କାର୍ଯ୍ୟ

         ରହିଛି ପ୍ରେରଣା 

           ଏକାଗ୍ରତା ମଧ୍ୟେ ।।

ଆରୋହଣ ନିମନ୍ତେ 

              ସଫଳତାର ସିଡି,

ନିଷ୍ଠା,ଧୈର୍ଯ୍ୟ,ଅଧ୍ୟବସାୟ ସମେତ

 ରହିଛି ଆବଶ୍ୟକ ଏକ 

              ଅମୋଘ ଅସ୍ତ୍ର -

ସେ ହେଉଛି ଏକାଗ୍ରତା ।।

*******

ପଳାସପଲ୍ଲୀ, ଗଞ୍ଜାମ

ଜୟୀ ରାଜଗୁରୁ

✍ସୁରଥ କୁମାର ରାଉତ


ପ୍ରଥମ ଓଡିଆ ଶହୀଦ ଭାବରେ

    ରାଜଗୁରୁ ପରିଚିତ

ଦେଶ ଜାତି ପାଇଁ ଜୀବନ ଉତ୍ସର୍ଗୀ

      ହୋଇଗଲେ ସେ ବିଖ୍ୟାତ।

ସପ୍ତଦଶ ଶହ ଅଣଚାଳିଶିର

  ଉନତ୍ରିଂଶ ଅକ୍ଟୋବର୍ 

ଜନ୍ମ ହୋଇଥିଲେ ପୁରୀ ଜିଲ୍ଲାସ୍ଥିତ

   ଗ୍ରାମ ହରେକୃଷ୍ଣ ପୁର।

ଖୋରଧାର ରାଜା ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବଙ୍କ

    ରାଜ ପୁରୋହିତ ଥିଲେ

ଦକ୍ଷତା ବଳରେ ସେନା ବାହିନୀର 

    ସେନାପତି ସାଜିଥିଲେ।

ପାଇକ ମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧ ଶିକ୍ଷା ଦେଇ

  ସୈନ୍ୟବାହିନୀ ଗଢିଲେ

ସ୍ବାଧୀନତା ପାଇଁ ଇଂରେଜ ବିରୁଦ୍ଧେ

   ସଂଗ୍ରାମ ଜାରୀ ରଖିଲେ।

ଦେଶଦ୍ରୋହୀଙ୍କର ଚକ୍ରାନ୍ତରେ ବନ୍ଦୀ

     ଜୟୀ ରାଜଗୁରୁ ହେଲେ

ନିର୍ଦ୍ଦୟ ଭାବରେ ଇଂରେଜ ଶାସକ

    ହତ୍ୟା ତାଙ୍କୁ କରିଥିଲେ।

ଜୟୀ ରାଜଗୁରୁ  ଜୀବନକୁ ଦେଲେ

    ନୁହାଁଇଲେ ନାହିଁ ମଥା

ଦେଶ ଜାତି ପାଇଁ ପ୍ରାଣବଳୀ ଦେଇ

   ରଖିଗଲେ କୀର୍ତ୍ତୀ ଗାଥା। 

ଆଜି ଭଳି ଶୁଭଜନମ ଦିନରେ

  ପାଦ ତଳେ ଦଣ୍ତବତ

ଉତ୍କଳ ମାଟିରେ ତୁମ ପରି ବୀର

    ଜନ୍ମୁଥାନ୍ତୁ ଶତ ଶତ।

<============<<

ବନ୍ଧୁପୁର,ସମିତଙ୍ଗା,କଟକ

Thursday, October 29, 2020

ତବ ସାଥେ ଅନୁଗାମେ

ତାପ୍ତିମୟୀ ପଣ୍ଡାମିଶ୍ର, 
ମେଲଛାମୁଣ୍ଡା ବରଗଡ ।

ଆହେ ଆର୍ତ୍ତତ୍ରାଣ କର ପରିତ୍ରାଣ 

ମୋକ୍ଷ ନିର୍ବାଣ ମୋ ଅର୍ଥେ 

କରେ ମୁଁ ବିନତି ହାତ ଯୋଡି ପଦେ 

ଭାଗ୍ୟ ଡୋରୀ ତୁମ ହାତେ ।।


ବିଧିର ବିଧାନ କରିଦିଅ ଆନ 

ନିରାଶା ଜୁଆରେ ଡୁବେ 

ପଥହରା ମୁଁ ଯେ ପଥିକ ଟିଏ ହେ

ଦୁଃଖ ସାଗର ଏଭବେ ।।


ପୂଣ୍ୟ ତରି ଟିଏ ତୁମେ ତ' କାଳିଆ 

ଭରସା କରି ଚାଲିଛି 

ଜୀବନ ପରିଧି ବେଷ୍ଟନୀ ଭିତରେ 

ନିତି ତୁମକୁ ଖୋଜୁଛି ।।


ତୁଣ୍ଡେ ହରି ନାମ ମହାମନ୍ତ୍ର ଧରି 

କୃଷ୍ଣମୟ କରି ପ୍ରାଣ 

ସାନିଧ୍ୟ ଟିକିଏ ପାଇବା ପାଇଁ କି 

ପ୍ରତିକ୍ଷିତ ଏ ଜୀବନ ।।


କୃଷ୍ଣ ନାମ ସାର ସବୁ ତ' ଅସାର 

କଳି ଯୁଗେ ତରିବାକୁ 

ହୃଦୟ ବୀଣା ମୋ ଝଙ୍କୃତ ହେଉଛି 

ସଂକିର୍ତ୍ତନ ଶୁଣିବାକୁ ।।


ନାମାମୃତ ପିଇ ତୃଷ୍ଣା ମେଣ୍ଟାଉଛି 

ମଜ୍ଜି ରହି କୃଷ୍ଣ ନାମେ 

ଛନ୍ଦି ଦିଅ ଥରେ ମୋ ହୃଦ ତନ୍ତ୍ରୀକୁ 

ତବ ସାଥେ ଅନୁଗାମେ ।।


🚩🚩ତୁହି ମା ଉତ୍କଳ ମାତା🚩🚩

✍🏻ରଶ୍ମିତା ଜେନା (ଶିକ୍ଷୟିତ୍ରୀ)

ନୟାପଲ୍ଲୀ,ଭୁବନେଶ୍ୱର


ବୀର ପ୍ରସବିନୀ ହେ ପୂଜ୍ୟା ଜନନୀ 

      ଅପରୂପା ଅନିନ୍ଦିତା 

ପୁଣ୍ୟ ଗର୍ଭେ ତୋର ପ୍ରଗତି ର ଭାର 

       ଯୁଗ ଯୁଗ ଦିବ୍ୟ ଗାଥା 

ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ଗୌରବ ଉତ୍କର୍ଷ ଐତିହ୍ୟ

      ଯା ବକ୍ଷେ ସଦା ସାଇତା.......... 

 ପୂର୍ଣ୍ଣଗର୍ଭା ଚିର ନମସ୍ୟା

ତୁହି ମା ଉତ୍କଳ ମାତା        lll


ତୋ ସ୍ନେହୀ କୋଳ କୁ ଆବୋରି ବସିଲେ 

         ଐର ଯଯାତି ଅନଙ୍ଗ

  ମୁକୁନ୍ଦ ପ୍ରତାପ ଲାଙ୍ଗୁଳା ଚୋଡ଼ଗଙ୍ଗ 

       ଧନ୍ୟ ବୀର ଉତ୍ତମାଙ୍ଗ   

ବିଜୟ ବାହୁଡା଼ ପଥ ଧାର ଚାହିଁ                   

   ଓଡ଼ିଆଣୀ ଜାଳେ ସଳିତା.....

ପୁଣ୍ୟ ପ୍ରଦାୟିନୀ ମା ମୋର 

ତୁହି ମା ଉତ୍କଳ ମାତା         lll


ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣାକ୍ଷରେ ଲେଖା କୋଣାର୍କ ମନ୍ଦିର 

       ଧର୍ମପଦ ର କଥା 

ପତିତ ପାବନ ଜଗନ୍ନାଥ ଧାମ 

      ଉତ୍କଳ ଆଦି ଦେବତା 

ପୟର ପଖାଳେ ପାରାବାର ଯାର 

    ତରଙ୍ଗ ଗାଉଛି ଗାଥା....... 

  ପୂର୍ଣ୍ଣଗର୍ଭା ଚିର ପବିତ୍ରା 

ତୁହି ମା ଉତ୍କଳ ମାତା          ll


ସାରଳା ଉପେନ୍ଦ୍ର ରାଧାନାଥ ଭଞ୍ଜ 

     ସୃଷ୍ଟି ତାଙ୍କ କାଳଜୟୀ

ଚଣ୍ଡାଶୋକ ହୁଏ ଧର୍ମ ରେ ଉଦବୁଦ୍ଧ  

     ଏହି ଭବ୍ୟ କ୍ଷେତ୍ର ସେହି 

ଭାଗ୍ୟବାନ କରେ ଭାଗବତ ମାଳା

ଓଡ଼ିଆ ଆତ୍ମା ର କଥା..........

ସଦା ବିଜେ ଶାନ୍ତି ସମତା..... 

ତୁହି ମା ଉତ୍କଳ ମାତା          lll


ସଙ୍ଗୀତ ନୃତ୍ୟ ରେ ବିଶ୍ୱରେ ବରେଣ୍ୟ             

         ଓଡ଼ିଆ ଙ୍କ କାରିଗରୀ 

କଳା ନୈପୁଣ୍ୟ ର ଭାସ୍କର୍ଯ୍ୟ ଭୂଇଁ ଏ 

      ଯୁଗ ଯୁଗ ଶୋଭା ଶିରୀ 

ଝାଞ୍ଜ ମର୍ଦ୍ଦଳ ରେ ନିତି ଶୁଭେ ଯାର 

         ମମତା ଓ ମହନୀୟତା...... 

 ବିଶ୍ୱେ ଦେଉ ଶାନ୍ତି ବାରତା  

ତୁହି ମା ଉତ୍କଳ ମାତା          lll

ଦଶହରା ଅନୁଭୁତି


          ସୁକାନ୍ତ ଖଣ୍ଡା

ଦିନେଶ ଦଶହରା ଦେଖିବାକୁ ଉତ୍ସୁକତା ବଶତଃ ଘଟଗାଁ ବୁଲି ଯାଇଥିଲା। ତାକୁ ମାଆ ଦଶଭୁଜା ଦର୍ଶନ କରିବାର ଥିଲା। ପ୍ରାର୍ଥନା,ପ୍ରଣାମ ଓ ଆଶୀର୍ବାଦ ନେବାର ଥିଲା। ଦେହ ଓ ମନରେ ଅସରନ୍ତି ଭାବନା। ମାଆ ଘରେ ନବରାତ୍ର ପାଳୁଥିଲେ ତ କୌଣସି ଆଡେ଼ ବୁଲିବାକୁ ଦେଉ ନ ଥିଲେ। ସବୁଦିନ ମାଆଙ୍କୁ ସାହାଯ୍ଯ ସହଯୋଗ ସାଙ୍ଗେ ନବରାତ୍ରରେ ସମୟ କଟେଇ ଦେଇଛି। ଆଜି ବିଜୟା ଦଶମୀ ମୋତେ ମାଆ ଦଶ ଭୁଜାଙ୍କର ଦର୍ଶନ ନେବାର ଅଛି।

          ଦିନେଶ ଘରେ କାହାକୁ କିଛି ନ କହି ଘଟଗାଁ ଚାଲିଚାଲି ଦଶ କି.ମି. ପଳେଇଲା। ତା'ର ତ  ନିଶା କି ମାଆଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରିବ। ସେ ଭାରି ଆନନ୍ଦିତ ଯେ ଅଳ୍ପ ସମୟ ହେଉପଛେ ଦର୍ଶନ କରି ଫେରି ଆସିବ। ଦିନେଶ ଦୌଡି଼ଦୌଡି଼ ଯାଇ ଘଟଗାଁରେ ପହଂଚିଲା ଧଇଁସଇଁ ହୋଇ ମାଆ ଦର୍ଶନ କରିବାକୁ ଗଲାବେଳେ ପୋଲିସ୍ ହାବୁଡ଼ରେ ପଡି଼ଗଲା। ପୋଲିସ୍ କିଛି କହିବା ଆଗରୁ ଦୁଇଚାରି ଦେତ ଲଦିଦେଲେ। ଦିନେଶର ତ ଅଳ୍ପ ବୟସ ପୋଲିସଙ୍କ ନାଲି ଆଖି ଆଗରେ ସବୁ ଫିକା ପଡି ଯାଇଥିଲା। ସେ ଭେଁ କିନା କାନ୍ଦି ଉଠିଲା। ଦିନେଶ କିଛି କହିବା ଆଗରୁ ପୋଲିସ୍ କହିଲା,"ମୁହଁରେ ମାକ୍ସ କାହିଁ,ହାତରେ ସାନିଟାଇଜର ଲଗେଇଛୁ?" ଦିନେଶ ଏ ସବୁକୁ ବ୍ଯବହାର କରିବା ଜଣାଥିଲା ହେଲେ ମାଆଙ୍କର ଦର୍ଶନରେ ଏତେ ଆକୃଷ୍ଟ ଓ ବିଭୋର ହୋଇ ଯାଇଥିଲା ଯେ ଏସବୁ ଲଗେଇବା ଭୁଲି ଦୌଡି଼ ଆସିଲା। ପୋଲିସ୍ ଦେଖିଲା ମାତ୍ର ସାତ ଆଠ ବର୍ଷର ବାଳକଟିଏ । ମାଡ଼ ଦେଲେ ବି ହୃଦୟରେ ସ୍ଥାପନ ହେଲା ଦୟା ଓ କରୁଣା। ସେ ମାକ୍ସ ପିନ୍ଧାଇ ଓ ସାନିଟାଇଜର ଲଗେଇ ଦଶଭୁଜା ମାଆଙ୍କର ମେଢ଼ ବୁଲାଇ ପେଟେ ଭୋଗ ଖୁଆଇ ଥାନାରେ ଅଟକ ରଖିଲେ।

             କିଛି ସମୟ ପରେ ଦିନେଶକୁ ପଚାରି ବୁଝିଲେ କି ତୋ'ର ଘର ଠିକଣା ଓ ମୋବାଇଲ ନମ୍ବର। ଦିନେଶ ସବୁ ସତ କଥା କହିଲା ତ ପୋଲିସ୍ ମୋବାଇଲ ଲଗାଇଲେ। ମୋବାଇଲ ମାଆ କାନ୍ତିରାଣୀ ଧରିଲେ ଓ ନିଜ ସ୍କୁଟିରେ ଯାଇ ନେଇ ଆଣିବାକୁ ଗଲେ। ମାଆ ପୋଲିସ୍ ବାବୁଙ୍କୁ କୃତଜ୍ଞତା ଜଣାଇ ଓ ମାଆ ଦଶଭୁଜାଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରି ଦିନେଶକୁ ନେଇ ଆସିଲେ।

           ଘରେ ପହଁଚି ଦିନେଶ ମାଆ  ଦଶଭୁଜାଙ୍କ ଉଦ୍ଦେଶ୍ଯରେ ପ୍ରାର୍ଥନା କରି କହିଲା,"ମାଆ ! ଏମିତି କାହିଁକି ହେଲା। ମୁଁ ତ କେବଳ ଦର୍ଶନ ସାରି ଫେରି ଆସିଥାନ୍ତି। ଗହଳି ଭିତରକୁ କି କାହାକୁ ସୁଦ୍ଧା ଛୁଇଁ ନ ଥାନ୍ତି?" ଏ ଆକୁଳ ଡାକରେ ମାଆ ଆବିର୍ଭୁତା ହୋଇ ଦର୍ଶନ ଦେଇ କହିଲେ, "ଦିନେଶ ! କେତେବେଳେ ବି ନିଜକୁ ହାଲୁକା ଭାବରେ ନେବାକଥା ନୁହେଁ ଏବେ ତ ଚାରିଆଡେ଼ କଟକଣା। ସରକାରଙ୍କ ନୀତି ନ ମାନିବା ତ ବିପଦ ଘନେଇ ଆସିବ। ତୋତେ ଶିକ୍ଷା ଦିଆଗଲା କି ମାଆଙ୍କ ଉପଦେଶ ପାଳନ କରି ସୁକର୍ମ କରିବୁ ତ ଭଲ ମଣିଷ ହେବୁ। ଦିନେଶ ଦୁଇହାତ ଯୋଡି଼ଦେଇ ଆଖି ବନ୍ଦ ଓ ପ୍ରଣାମ କରି ପୁଣି ଅନେଇଲା ତ ମାଆ ଦଶଭୁଜା ପାଖରେ ନାହାଁନ୍ତି।

          ଅଥଚ ଦେହରେ ପୀଡା଼ ଦୂର ହୋଇ ଯାଇଛି। ଫଳି ଯାଇଥିବା ବେତର ଦାଗ ଲିଭିଯାଇଛି। ଆଉ ହୃଦୟ କୋଣରେ ଆନନ୍ଦର ଲହରୀ ଖେଳି ଯାଉଛି। ସେ ପୁଣି ଦୁଇହାତ ଯୋଡି଼ ପ୍ରଣାମ ଓ ଧନ୍ଯବାଦ ଜଣେଇଲା

                  *

ଶିକ୍ଷକ ମକାଶୁଖିଲା ପ୍ରାଥମିକ ବିଦ୍ଯାଳୟ ପୋ-ଚକ୍ରଧରପୁର ଭା-ହରିଚନ୍ଦନପୁର ଜି-କେନ୍ଦୁଝର ପି-୭୫୮୦୨୮

 

ସନ୍ଦେହ ତୁମକୁ

କବି ଗଗନ କୁମାର ଦାଶ


ସେ ଦିନ ସେଇଠି

ତୁମ ସ୍ମୃତି

ଖାଲି ମନେପଡେ ।


ତିନି ଛକିଆରେ

କେବଳ

ତୁମ ପ୍ରତିକ୍ଷାରେ ।


ଗାଁ ରେ

ମୃଦୁ ଗୁଞ୍ଜରଣ

ତୁମେ କୁଆଡେ ଅନ୍ୟ ପାଇଁ

ମନ୍ଦିରରେ ପ୍ରଦୀପ ଜାଳୁଛ।


ସନ୍ଦେହ ମୋର ତୁମକୁ

ଏଣୁ ଜଗି ରହେ

ସକାଳ ପାଞ୍ଚଟାରୁ

ପାହାନ୍ତିଆ ଚାରିଟା ଯାଏଁ

ତୁମ ଚଉହଦ ଚାରିପଟେ

ପଇଁତରା ମାରେ ।


ବାରଂବାର 

ମନ ମୋର ଚଞ୍ଚଳିତ

ଏ ପଟୁ ସେ ପଟ ହୁଏ

କାଳେ କଥା ଦି ପଦ

କିଛି ହସ କିଛି ଅଭିମାନ ।


କିମ୍ବା

ଯଦି ଦେଖା ହୁଏ 

ଆଡ ଚାହାଣିରେ

ମନ ମୋର ବ୍ୟତିବ୍ୟସ୍ତ

କିଛି ଜିଜ୍ଞାସା ଭିତରେ

କିଛି ସନ୍ଦେହରେ ।


ଏଣୁ 

ସନ୍ଦେହର ନିଆଁ ଜଳେ

ମୋର ହୃଦୟରେ

ମୋର ମନ ଜଳିଯାଏ ।


ତୁମେ କିନ୍ତୁ କୁହ

ନା

ମୁଁ ତୁମକୁ କେବଳ

ଭଲପାଏ।


ପ୍ରେରଣ ତାରିଖ = ୨୯.୧୦.୨୦୨୦
ଶୁଭଙ୍କର ନିବାସ
ମାଁ ମାଣିକେଶ୍ଵରୀ  ସାହି
ମୋହନା, ଗଜପତି-୭୬୧୦୧୫

ସନ୍ତାନ

 ସୂର୍ଯ୍ୟ ନାରାୟଣ ସାବତ


ସନ୍ତାନ ନିଶ୍ୱର ସର୍ବସ୍ୱ,

ସନ୍ତାନ ଜୀବର ମୂଳସ୍ୱ,

ସନ୍ତାନ ଏକ ସ୍ୱପ୍ନିଳ ବାସ୍ତବ,

ସନ୍ତାନ ଏକ ବାସ୍ତବିକ ସ୍ୱପ୍ନ ।


କେବେ ଦିନେ ଦେବ ଉପହାର,

କେବେ ହୁଏ ରାଷ୍ଟ୍ରିୟ ସମ୍ପତ୍ତି,

କେବେ ପୁଣି ବିଶ୍ୱ ସମୁଦାୟ

କଳି ବସେ ସୃଷ୍ଟିର ବିପତ୍ତି !


କେବେ ସିଏ ଅନ୍ଧର ଲଉଡି,

କେବେ ସିଏ ନିଧନ ସଙ୍ଖାଳି,

କେବେ ହୁଏ ଦୁଃଖର କାରଣ,

କେବେ ପୁଣି ପାଦର ସିଙ୍କୁଳି !


ସୁସନ୍ତାନ ଦୁନିଆକୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅବଦାନ,

ଦେଶ ଦଶ ସପ୍ତ ପୁରୁଷର ଟେକ,

କୁପୁତ୍ର ଆଣେ ଅପଯ୍ୟଶ,

ଜାତି,କୁଳ କରେ ସର୍ବନାଶ ।


ସହକାରୀ ଶିକ୍ଷକ,
ସରକାରୀ ବାଳିକା ଉଚ୍ଚ ବିଦ୍ୟାଳୟ,
ନୂଆଗାଁ
ବୋରିଗୁମ୍ମା ବ୍ଲକ, କୋରାପୁଟ ଜିଲ୍ଲା

Disclaimer

For all support related issues or to reach our team, Please check below details.
Ph. +91 8668656155 | contact@spreadhappiness.co.in | Link : https://www.facebook.com/spreadhpy